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PostHeaderIcon श्री गणेश चतुर्थी पूजा विधि – व्रत कथा

श्री विनायक चतुर्थी पूजा - कथा- Sri Ganesh Chaturthi Puja Process and Katha

 

भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन सिद्धि विनायक व्रत किया जाता है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 2011, में यह व्रत 1 सितम्बर, गुरुवार के दिन किया जायेगा. इस व्रत के फल इस व्रत के अनुसार प्राप्त होते है. भगवान श्री गणेश को जीवन की विध्न-बाधाएं हटाने वाला कहा गया है. और श्री गणेश सभी कि मनोकामनाएं पूरी करते है. गणेशजी को सभी देवों में सबसे अधिक महत्व दिया गया है. कोई भी नया कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व भगवान श्री गणेश को याद किया जाता है. 

विनायक चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश का जन्म उत्सव का दिन है.  यह दिन गणेशोत्सव के रुप में सारे विश्व में बडे हि हर्ष व श्रद्वा के साथ मनाया जाता है. भारत में इसकी धूम यूं तो सभी प्रदेशों में होती है. परन्तु विशेष रुप से यह महाराष्ट में किया जाता है. इस उत्सव को महाराष्ट का मुख्य पर्व भी कहा जा सकता है. लोग मौहल्लों, चौराहों पर गणेशजी की स्थापना करते है. आरती और भगवान श्री गणेश के जयकारों से सारा माहौळ गुंज रहा होता है. इस उत्सव का अंत अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गणेश की मूर्ति समुद्र में विसर्जित करने के बाद होता है.  

श्री गणेश पूजा विधि

1. दीप प्रज्ज्वलन एवं पूजन

2. आचमन

3.पवित्रकरण (मार्जन)

4. आसन पूजा

5. स्वस्तिवाचन

6. संकल्प

Sankalp संकल्प : (दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले

‘ऊँ विष्णु र्विष्णुर्विष्णु : श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे —— नगरे —— ग्रामे वा बौद्धावतारे विजय नाम संवत्सरे श्री सूर्ये दक्षिणायने वर्षा ऋतौ महामाँगल्यप्रद मासोत्तमे शुभ भाद्रप्रद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थ्याम्‌ तिथौ भृगुवासरे हस्त नक्षत्रे शुभ योगे गर करणे तुला राशि स्थिते चन्द्रे सिंह राशि स्थिते सूर्य वृष राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायाँ चतुर्थ्याम्‌ शुभ पुण्य तिथौ —- गौत्रः —- अमुक शर्मा दासो ऽहं मम आत्मनः श्रीमन्‌ महागणपति प्रीत्यर्थम्‌ यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये।”

इसके पश्चात्‌ हाथ का जल किसी पात्र में छोड़ देवें।

7. श्री गणेश ध्यान 

8. आवाहन व प्रतिष्ठापन

Ganpati Aawahanam आवाहन

नागास्यम्‌ नागहारम्‌ त्वाम्‌ गणराजम्‌ चतुर्भुजम्‌। भूषितम्‌ स्व-आयुधै-है पाश-अंकुश परश्वधैहै॥

आवाह-यामि पूजार्थम्‌ रक्षार्थम्‌ च मम क्रतोहो। इह आगत्व गृहाण त्वम्‌ पूजा यागम्‌ च रक्ष मे॥

ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धिसहिताय गण-पतये नमह, गणपतिम्‌-आवाह-यामि स्थाप-यामि। (गंधाक्षत अर्पित करें।)

Pratisthhapan प्रतिष्ठापन

आवाहन के पश्चात देवता का प्रतिष्ठापन करें-

अस्यै प्राणाहा प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाह क्षरन्तु च। अस्यै देव-त्वम्‌-अर्चायै माम-हेति च कश्चन॥ ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहित-गणपते सु-प्रतिष्ठितो वरदो भव।

9. स्नान

10. वस्त्र एवं उपवस्त्र

11. गंध व सिन्दूर

12. पुष्प एवं पुष्पमाला

13. दूर्वा

14. धूप

15. दीप

16. नैवेद्य

17. दक्षिणा एवं श्रीफल

18. पुष्पों के सात श्री गणेश पूजा किजि ये – Offer Flowers to lord ganesha

विनायक अश्तोत्ताराम्स 108 names of ganesha

श्री गणेश स्तुती , गणेशा अश्तोत्तारा सथानमा स्तोत्रं , श्री गणेशा पंचारातना स्तोत्रं

18. आरती

19. पुष्पाँजलि

Pushpanjali Mantra पुष्पाञ्जलि समर्पण

ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, मन्त्र-पुष्प-अंजलि समर्पयामि।

20. प्रदक्षिणा

21. प्रार्थना एवं क्षमा प्रार्थना

Pradikshna and Kshama Prarthana प्रदक्षिणा व क्षमाप्रार्थना

 

यानि कानि च पापानि ज्ञात-अज्ञात-कृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिण-पदे पदे॥

आवाहनम्‌ न जानामि न जानामि तवार्चनाम्‌ । यत्‌-पूजितम्‌ मया देव परि-पूर्णम्‌ तदस्तु मे ॥

अपराध सहस्त्राणि-क्रियंते अहर्नीशं मया । तत्‌सर्वम्‌ क्षम्यताम्‌ देव प्रसीद परमेश्वर ॥

22. प्रणाम एवं पूजा समर्पण।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा – Ganesh Chaturthi Vrat Story

श्री गणेश चतुर्थी व्रत को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलन में है. कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थें. वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिये चौपड खेलने को कहा. भगवान शंकर चौपड खेलने के लिये तो तैयार हो गये. परन्तु इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा?

इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी. और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते है. परन्तु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिये तुम बताना की हम मे से कौन हारा और कौन जीता.

यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया. खेल तीन बार खेला गया, और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई. खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिये कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई. और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने व किचड में पडे रहने का श्राप दे दिया. बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऎसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऎसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिये नाग कन्याएं आयेंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऎसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगें, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई.

ठिक एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं. नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालुम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया. उसकी श्रद्वा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए. और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिये कहा. बालक ने कहा की है विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों.

बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अन्तर्धान हो गए. बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गई. देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताये अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया. इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी. वह समाप्त होई.

यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई. यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई. माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया. व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें. उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है.   

विनायक चतुर्थी व्रत विधि (Vinayak Chaturthi Fast Method)

श्री गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन हुआ था. इसलिये इनके जन्म दिवस को व्रत कर श्री गणेश जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है. जिस वर्ष में यह व्रत रविवार और मंगलवार के दिन का होता है. उस वर्ष में इस व्रत को महाचतुर्थी व्रत कहा जाता है.   

इस व्रत को करने की विधि भी श्री गणेश के अन्य व्रतों के समान ही सरल है. गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास में कृ्ष्णपक्ष की चतुर्थी में किया जाता है,. पर इस व्रत की यह विशेषता है, कि यह व्रत सिद्धि विनायक श्री गणेश के जन्म दिवस के दिन किया जाता है. सभी 12 चतुर्थियों में माघ, श्रावण, भाद्रपद और मार्गशीर्ष माह में पडने वाली चतुर्थी का व्रत करन विशेष कल्याणकारी रहता है. 

व्रत के दिन उपवासक को प्रात:काल में जल्द उठना चाहिए. सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नान और अन्य नित्यकर्म कर, सारे घर को गंगाजल से शुद्ध कर लेना चाहिए. स्नान करने के लिये भी अगर सफेद तिलों के घोल को जल में मिलाकर स्नान किया जाता है. तो शुभ रहता है. प्रात: श्री गणेश की पूजा करने के बाद, दोपहर में गणेश के बीजमंत्र ऊँ गं गणपतये नम: का जाप करना चाहिए.

इसके पश्चात भगवान श्री गणेश  धूप, दूर्वा, दीप, पुष्प, नैवेद्ध व जल आदि से पूजन करना चाहिए. और भगवान श्री गणेश को लाल वस्त्र धारण कराने चाहिए. अगर यह संभव न हों, तो लाल वस्त्र का दान करना चाहिए.

पूजा में घी से बने 21 लड्डूओं से पूजा करनी चाहिए. इसमें से दस अपने पास रख कर, शेष सामग्री और गणेश मूर्ति किसी ब्राह्मण को दान-दक्षिणा सहित दान कर देनी चाहिए. 

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