Archive for September, 2011

नवरात्री की छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा

Thursday, September 29th, 2011

नवरात्री  दुर्गा पूजा छठा तिथि – माता कात्यायनी की पूजा :

माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी के नाम से पूजा जाता है. महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं. महर्षि कात्यायन ने इनका पालन-पोषण किया तथा महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा को कात्यायनी कहा गया.

देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं. देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है. इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है. योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं. साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है.

माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है. यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं.  इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है अन्य हाथों में  तलवार तथा कमल का फूल है.

माँ कात्यायनी की पूजा विधि :

जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के छठे दिन माँ कात्यायनी जी की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को आज्ञा चक्र में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए. माँ कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, कर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है.

दुर्गा पूजा के छठे दिन भी सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं. इनकी पूजा के पश्चात देवी कात्यायनी जी की पूजा कि जाती है. पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है ||

देवी कात्यायनी के मंत्र : 

चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माता कात्यायनी की ध्यान : 

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥

स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥

पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥

माता कात्यायनी की स्तोत्र पाठ : 

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

देवी कात्यायनी की कवच :

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

देवी की पूजा के पश्चात भगवान शंकर और ब्रह्मा की पूजा करें.सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें और दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें.

इस प्रकार दुर्गा  की  आरती होती है. 

आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती  गीत भक्त जन गाते हैं ||

देवी कात्यायनी की कात्यायनी कथा : 

देवी कात्यायनी जी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार एक समय कत नाम के प्रसिद्ध ॠषि हुए तथा उनके पुत्र ॠषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से, विश्वप्रसिद्ध ॠषि कात्यायन उत्पन्न हुए थे.  देवी कात्यायनी जी देवताओं ,ऋषियों के संकटों को दूर करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में उत्पन्न होती हैं. महर्षि कात्यायन जी ने देवी पालन पोषण किया था. जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज़ और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था और  ॠषि कात्यायन ने भगवती जी कि कठिन तपस्या, पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं. 

महर्षि कात्यायन जी की इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें. देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की तथा अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेने के पश्चात शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनों तक कात्यायन ॠषि ने इनकी पूजा की, दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया ओर देवों को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त किया.

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नवरात्री के पंचमी दिन माता स्कंदमाता की पूजा

Thursday, September 29th, 2011

नवरात्री  दुर्गा पूजा पंचमी तिथि – स्कंदमाता की पूजा

माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है. भगवान स्कन्द कुमार (कार्तिकेय)की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवे स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है. भगवान स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुध्द चक्र में अवस्थित होता है. स्कन्द मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजायें हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कन्द को गोद में पकडे हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। माँ का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है|

माँ स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं| इनकी उपासना करने से साधक अलौकिक तेज की प्राप्ति करता है | यह अलौकिक प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता है| एकाग्रभाव से मन को पवित्र करके माँ की स्तुति करने से दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है|

स्कन्दमाता  की पूजा विधि :

कुण्डलिनी जागरण के उद्देश्य से जो साधक दुर्गा मां की उपासना कर रहे हैं उनके लिए दुर्गा पूजा का यह दिन विशुद्ध चक्र (Visuddha Chakra) की साधना का होता है. इस चक्र का भेदन करने के लिए साधक को पहले मां की विधि सहित पूजा करनी चाहिए. पूजा के लिए कुश अथवा कम्बल के पवित्र आसन पर बैठकर पूजा प्रक्रिया को उसी प्रकार से शुरू करना चाहिए जैसे आपने अब तक के चार दिनों में किया है फिर इस मंत्र से देवी की प्रार्थना करनी चाहिए “सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया. शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी.

अब पंचोपचार विधि से देवी स्कन्दमाता की पूजा कीजिए. नवरात्रे की पंचमी तिथि को कहीं कहीं भक्त जन उद्यंग ललिता का व्रत (Udyang Lalita Vrat) भी रखते हैं. इस व्रत को फलदायक कहा गया है. जो भक्त देवी स्कन्द माता की भक्ति-भाव सहित पूजन करते हैं उसे देवी की कृपा प्राप्त होती है. देवी की कृपा से भक्त की मुराद पूरी होती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है.

स्कन्दमाता की मंत्र : 

सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

स्कन्दमाता की ध्यान : 

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।

धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥

प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

स्कन्दमाता की  स्तोत्र पाठ : 

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥

शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥

महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥

अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥

नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥

सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥

तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥

सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥

स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥

पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥

स्कन्दमाता की कवच :

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥

श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥

वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥

इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

वात, पित्त, कफ जैसी बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति को स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए और माता को अलसी चढ़ाकर प्रसाद में रूप में ग्रहण करना चाहिए ||

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैंदुर्गा सप्तशती पाठ विधि

भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने महान व्रत किया उस महादेव की पूजा भी आदर पूर्वक करें क्योंकि इनकी पूजा न होने से देवी की कृपा नहीं मिलती है || श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए ||

सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें और दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें.

इस प्रकार दुर्गा  की  आरती होती है. 

आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती  गीत भक्त जन गाते हैं ||

स्कन्द माता कथा :

दुर्गा पूजा के पांचवे दिन देवताओं के सेनापति कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा होती है. कुमार कार्तिकेय को ग्रंथों में सनत-कुमार, स्कन्द कुमार के नाम से पुकारा गया है. माता इस रूप में पूर्णत: ममता लुटाती हुई नज़र आती हैं. माता का पांचवा रूप शुभ्र अर्थात श्वेत है.

जब अत्याचारी दानवों का अत्याचार बढ़ता है तब माता संत जनों की रक्षा के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का अंत करती हैं. देवी स्कन्दमाता की चार भुजाएं हैं, माता अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करती हैं और एक भुजा में भगवान स्कन्द या कुमार कार्तिकेय को सहारा देकर अपनी गोद में लिये बैठी हैं. मां का चौथा हाथ भक्तो को आशीर्वाद देने की मुद्रा मे है.

देवी स्कन्द माता ही हिमालय की पुत्री पार्वती हैं इन्हें ही माहेश्वरी और गौरी के नाम से जाना जाता है. यह पर्वत राज की पुत्री होने से पार्वती कहलाती हैं, महादेव की वामिनी यानी पत्नी होने से माहेश्वरी कहलाती हैं और अपने गौर वर्ण के कारण देवी गौरी के नाम से पूजी जाती हैं. माता को अपने पुत्र से अधिक प्रेम है अत: मां को अपने पुत्र के नाम के साथ संबोधित किया जाना अच्छा लगता है. जो भक्त माता के इस स्वरूप की पूजा करते है मां उस पर अपने पुत्र के समान स्नेह लुटाती हैं.

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नवरात्री की चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा

Thursday, September 29th, 2011

नवरात्री  दुर्गा पूजा चौथे तिथि – माता कूष्माण्डा की पूजा :

मां दुर्गा के नव रूपों में चौथा रूप है कूष्माण्डा देवी का (Durga Devi Chaturth Roop Devi Kushmanda). दुर्गा पूजा के चौथे दिन देवी कूष्माण्डा जी की पूजा का विधान है.  देवी कूष्माण्डा अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है.

इस दिन भक्त का मन ‘अनाहत’ चक्र में स्थित होता है, अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और शांत मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा करनी चाहिए. संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है.

देवी कुष्मांडा पूजा विधि :

जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को अनहत चक्र (Anhat chakra) में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए. इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कूष्माण्डा सफलता प्रदान करती हैं जिससे व्यक्ति सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है और मां का अनुग्रह प्राप्त करता है.

दुर्गा पूजा के चौथे दिन देवी कूष्माण्डा की पूजा का विधान उसी प्रकार है जिस प्रकार देवी ब्रह्मचारिणी और चन्द्रघंटा की पूजा की जाती है. इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं. इनकी पूजा के पश्चात देवी कूष्माण्डा की पूजा करे: पूजा की विधि शुरू करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर इस मंत्र का ध्यान करें “सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च. दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे..”

कुष्मांडा की मंत्र :

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ कूष्मांडा का उपासना मंत्र :

“कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा”

कुष्मांडा की ध्यान :

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

 कुष्मांडा की स्तोत्र पाठ :

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

कुष्मांडा की कवच :

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥

कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावतु॥

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने महान व्रत किया उस महादेव की पूजा भी आदर पूर्वक करें क्योंकि इनकी पूजा न होने से देवी की कृपा नहीं मिलती है || श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए ||

सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें और दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें.

इस प्रकार दुर्गा  की  आरती होती है. 

आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती  गीत भक्त जन गाते हैं ||

देवी कुष्मांडा कथा :

दुर्गा सप्तशती के कवच में लिखा है कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा. इसका अर्थ है वह देवी जिनके  उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कूष्माण्डा हैं. देवी कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं. जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था

देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गयी और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ. इस देवी का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं.

देवी कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है. देवी अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा है. देवी के आठवें हाथ में बिजरंके (कमल फूल का बीज) का माला है है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है. देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं. जो भक्त श्रद्धा पूर्वक इस देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक का अंत होता है और आयु एवं यश की प्राप्ति होती है.

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नवरात्री के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा

Wednesday, September 28th, 2011

  

नवरात्री  दुर्गा पूजा तीसरे तिथि – माता चंद्रघंटा की पूजा

देवी दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है. दुर्गा पूजा के तीसरे दिन आदि-शक्ति दुर्गा के तृतीय स्वरूप माँ  चंद्रघंटा की पूजा होती है.  देवी चन्द्रघण्टा भक्त को सभी प्रकार की बाधाओं एवं संकटों से उबारने वाली हैं. इस दिन का दुर्गा पूजा में विशेष महत्व बताया गया है तथा इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन किया जाता है. माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक एवं दिव्य सुगंधित वस्तुओं के दर्शन तथा अनुभव होते हैं, इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है यह क्षण साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं.

चंद्रघंटा – नवरात्री  की तीसरी दिन :

चन्द्रघंटा देवी का स्वरूप तपे हुए स्वर्ण के समान कांतिमय है. चेहरा शांत एवं सौम्य है और मुख पर सूर्यमंडल की आभा छिटक रही होती है. माता के सिर पर अर्ध चंद्रमा मंदिर के घंटे के आकार में सुशोभित हो रहा जिसके कारण देवी का नाम चन्द्रघंटा हो गया है. अपने इस रूप से माता देवगण, संतों एवं भक्त जन के मन को संतोष एवं प्रसन्न प्रदान करती हैं. मां चन्द्रघंटा अपने प्रिय वाहन सिंह पर आरूढ़ होकर अपने दस हाथों में खड्ग, तलवार, ढाल, गदा, पाश, त्रिशूल, चक्र,धनुष, भरे हुए तरकश लिए मंद मंद मुस्कुरा रही होती हैं. माता का ऐसा अदभुत रूप देखकर ऋषिगण मुग्ध होते हैं और वेद मंत्रों द्वारा देवी चन्द्रघंटा की स्तुति करते हैं.

माँ चन्द्रघंटा की कृपा से समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं. देवी चंद्रघंटा की मुद्रा सदैव युद्ध के लिए अभिमुख रहने की होती हैं, इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है इनकी अराधना सद्य: फलदायी है, समस्त भक्त जनों को देवी चंद्रघंटा की वंदना करते हुए कहना चाहिए ” या देवी सर्वभूतेषु चन्द्रघंटा रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:”.. अर्थात देवी ने चन्द्रमा को अपने सिर पर घण्टे के सामान सजा रखा है उस महादेवी, महाशक्ति चन्द्रघंटा को मेरा प्रणाम है, बारम्बार प्रणाम है. इस प्रकार की स्तुति एवं प्रार्थना करने से देवी चन्द्रघंटा की प्रसन्नता प्राप्त होती है.

देवी चंद्रघंटा पूजा विधि :

देवी चन्द्रघंटा की भक्ति से आध्यात्मिक और आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है. जो व्यक्ति  माँ चंद्रघंटा की श्रद्धा एवं भक्ति भाव सहित पूजा करता है उसे मां की कृपा प्राप्त होती है जिससे वह संसार में यश, कीर्ति एवं सम्मान प्राप्त करता है. मां के भक्त के शरीर से अदृश्य उर्जा का विकिरण होता रहता है जिससे वह जहां भी होते हैं वहां का वातावरण पवित्र और शुद्ध हो जाता है, इनके घंटे की ध्वनि सदैव भक्तों की प्रेत-बाधा आदि से रक्षा करती है तथा उस स्थान से भूत, प्रेत एवं अन्य प्रकार की सभी बाधाएं दूर हो जाती है.

जो साधक योग साधना कर रहे हैं उनके लिए यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस दिन कुण्डलनी जागृत करने हेतु स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhisthan Chakra) से एक चक्र आगे बढ़कर मणिपूरक चक्र (Manipurak Chakra) का अभ्यास करते हैं. इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है . इस देवी की पंचोपचार सहित पूजा करने के बाद उनका आशीर्वाद प्राप्त कर योग का अभ्यास करने से साधक को अपने प्रयास में आसानी से सफलता मिलती है.

तीसरे दिन की पूजा का विधान भी लगभग उसी प्रकार है जो दूसरे दिन की पूजा का है. इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी-देवता, तीर्थों, योगिनियों, नवग्रहों, दशदिक्पालों, ग्रम एवं नगर देवता की पूजा अराधना करें फिर माता के परिवार के देवता, गणेश (Ganesh), लक्ष्मी (Lakshmi), विजया (Vijya), कार्तिकेय (Kartikey), देवी सरस्वती(Saraswati), एवं जया (Jaya) नामक योगिनी की पूजा करें फिर देवी चन्द्रघंटा की पूजा अर्चना करें.

चन्द्रघंटा की मंत्र :

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

चन्द्रघंटा की  ध्यान :

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥

मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

चन्द्रघंटा की   स्तोत्र पाठ : 

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥

नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

चन्द्रघंटा की   कवच : 

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥

बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥

कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने महान व्रत किया उस महादेव की पूजा भी आदर पूर्वक करें क्योंकि इनकी पूजा न होने से देवी की कृपा नहीं मिलती है ||

सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें और दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें.

इस प्रकार दुर्गा  की  आरती होती है. 

आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती  गीत भक्त जन गाते हैं ||

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नवरात्री के दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा

Wednesday, September 28th, 2011

नवरात्री  दुर्गा पूजा दूसरे तिथि – माता ब्रह्मचारिणी की पूजा :

नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है.  देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है. देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है. माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है, तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है.

ब्रह्मचारिणी – नवरात्री दूसरा दिन

देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है. मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है. ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी. यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं. मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है.

देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है. देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं. इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा (Goddess Brahmcharini is Tapashcharini, Aparna and Uma.). इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है. इस चक्र में अवस्थित साधक मां ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है.

ब्रह्मचारिणी पूजा विधि :

देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान इस प्रकार है, सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें. प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें. कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें. इनकी पूजा के पश्चात मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें.

देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”.. इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एक विशेष फूल) व कमल काफी पसंद है उनकी माला पहनायें. प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें. अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी..

ब्रह्मचारिणी की मंत्र :

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

ब्रह्मचारिणी की ध्यान :

वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥

गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥

परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ :

तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

ब्रह्मचारिणी की कवच :

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥

पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।

अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं -  दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने महान व्रत किया उस महादेव की पूजा भी आदर पूर्वक करें क्योंकि इनकी पूजा न होने से देवी की कृपा नहीं मिलती है. दक्ष प्रजापति द्वारा शिव की उपेक्षा के कारण माता ने पूर्व जन्म में स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया और किसी भी देवता ने प्रजापति का प्रसाद ग्रहण नहीं किया जिससे उन्हें महान दोष लगा अत: देवी की प्रसन्नता हेतु शिव जी पूजा आवश्यक कहा गया है.

सबसे अंत में ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत, सहित सभी सामग्री हाथ में लेकर “ॐ ब्रह्मणे नम:” कहते हुए सामग्री भूमि पर रखें और दोनों हाथ जोड़कर सभी देवी देवताओं को प्रणाम करें.

इस प्रकार दुर्गा  की  आरती होती है. 

आरती में जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती  गीत भक्त जन गाते हैं ||

देवी ब्रह्मचारिणी कथा :

माता ब्रह्मचारिणी हिमालय और मैना की पुत्री हैं. इन्होंने देवर्षि नारद जी के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें मनोवांछित वरदान दिया. जिसके फलस्वरूप यह देवी भगवान भोले नाथ की वामिनी अर्थात पत्नी बनी. जो व्यक्ति अध्यात्म और आत्मिक आनंद की कामना रखते हैं उन्हें इस देवी की पूजा से सहज यह सब प्राप्त होता है. देवी का दूसरा स्वरूप योग साधक को साधना के केन्द्र के उस सूक्ष्मतम अंश से साक्षात्कार करा देता है जिसके पश्चात व्यक्ति की ऐन्द्रियां अपने नियंत्रण में रहती और साधक मोक्ष का भागी बनता है.

इस देवी की प्रतिमा की पंचोपचार सहित पूजा करके जो साधक स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhisthan Chakra) में मन को स्थापित करता है उसकी साधना सफल हो जाती है और व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है.  जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धादुर्गा पूजा के दूसरे दिन मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है और प्रसन्न रहता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता है.

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नवरात्री के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा

Wednesday, September 28th, 2011

नवरात्री  दुर्गा पूजा पहले तिथि – माता शैलपुत्री की पूजा

मां दुर्गा शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक सनातन काल से मनाया जाता रहा है. आदि-शक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में पूजा की जाती है. अत: इसे नवरात्र के नाम भी जाना जाता है. सभी देवता, राक्षस, मनुष्य इनकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहते हैं. यह हिन्दू समाज का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसका धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिक व सांसारिक इन चारों ही दृष्टिकोण से काफी महत्व है.

 दुर्गा पूजा का त्यौहार वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में (Chaitra Durga Puja  Ashwin Masa durga Pooja). चैत्र माह में देवी दुर्गा की पूजा बड़े ही धूम धाम से की जाती है लेकिन आश्विन मास का विशेष महत्व है. दुर्गा सप्तशती में भी आश्विन माह के शारदीय नवरात्रों की महिमा का विशेष बखान किया गया है. दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है.

वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्।।

 शैलपुत्री – नवरात्री प्रथम दिन

नवरात्र पूजन के प्रथम दिन मां शैलपुत्री जी का पूजन होता है. शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है, माँ शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में साधक अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं, शैलपुत्री का पूजन करने से ‘मूलाधार चक्र’ जागृत होता है और यहीं से योग साधना आरंभ होती है जिससे अनेक प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं.

मंत्र :वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।

 कलश स्थापना:

नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापना के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की शुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगा-जल से भूमि को लिपा जाता है. 

शैलपुत्री  पूजा विधि:

शारदीय नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है. पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है. दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम पूजते हैं .अत: इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना सहित उनका आहवान किया जाता है. कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है.

इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है. इसे जयन्ती (Jayanti) कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”. इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं।

कलश स्थापना के पश्चात देवी का आह्वान किया जाता है कि ‘हे मां दुर्गा हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें’.

देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है तथा भगवान भोले नाथ की भी पूजा की जाती है. प्रथम पूजन के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती हैं.

शैलपुत्री की ध्यान :

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्

शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ:

प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

शैलपुत्री की कवच :

ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

नवरात्री में दुर्गा की दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं ||   दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है.

आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती  गीत भक्त जन गाते हैं ||

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दुर्गा सप्तशती – सप्तशती पाठ विधि

Wednesday, September 28th, 2011

दुर्गा सप्तशती पाठ विधि:-

नवरात्र घट स्थापना (ऐच्छिक):-

नवरात्र का श्रीगणेश शुक्ल पतिपदा को प्रात:काल के शुभमहूर्त में घट स्थापना से होता है। घट स्थापना हेतु मिट्टी अथवा साधना के अनुकूल धातु का कलश लेकर उसमे पूर्ण रूप से जल एवं गंगाजल भर कर कलश के उपर (मुँह पर) नारियल(छिलका युक्त) को लाल वस्त्र/चुनरी से लपेट कर अशोक वृक्ष या आम के पाँच पत्तो सहित रखना चाहिए। पवित्र मिट्टी में जौ के दाने तथा जल मिलाकर वेदिका का निर्माण के पश्चात उसके उपर कलश स्थापित करें। स्थापित घट पर वरूण देव का आह्वान कर पूजन सम्पन्न करना चाहिए। फिर रोली से स्वास्तिक बनाकर अक्षत एवं पुष्प अर्पण करना चाहिए।

कुल्हड़ में जौ बोना(ऐच्छिक):-

नवरात्र के अवसर पर नवरात्रि करने वाले व्यक्ति विशेष शुद्ध मिट्टी मे, मिट्टी के किसी पात्र में जौ बो देते है। दो दिनो के बाद उसमे अंकुर फुट जाते है। यह काफी शुभ मानी जाती है।

मूर्ति या तसवीर स्थापना(ऐच्छिक):-

माँ दुर्गा, श्री राम, श्री कृष्ण अथवा हनुमान जी की मूर्ती या तसवीर को लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीले वस्त्र(अपनी सुविधानुसार) के उपर स्थापित करना चाहिए। जल से स्नान के बाद, मौली चढ़ाते हुए, रोली अक्षत(बिना टूटा हुआ चावल), धूप दीप एवं नैवेध से पूजा अर्चना करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति(ऐच्छिक):-

नवरात्र के दौरान लगातार नौ दिनो तक अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित की जाती है। किंतु यह आपकी इच्छा एवं सुविधा पर है। आप केवल पूजा के दौरान ही सिर्फ दीपक जला सकते है।

आसन:-

लाल अथवा सफेद आसन पूरब की ओर बैठकर नवरात्रि करने वाले विशेष को पूजा, मंत्र जप, हवन एवं अनुष्ठान करना चाहिए।

नवरात्र पाठ:-

माँ दुर्गा  की  साधना के लिए  श्री दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ अर्गला, कवच, कीलक सहित करना चाहिए। श्री राम के उपासक को ‘राम रक्षा स्त्रोत’, श्री कृष्ण के उपासक को ‘भगवद गीता’ एवं हनुमान उपासक को‘सुन्दरकाण्ड’ आदि का पाठ करना चाहिए।

भोगप्रसाद:- प्रतिदिन देवी एवं देवताओं को श्रद्धा अनुसार विशेष अन्य खाद्द्य पदार्थो के अलावा हलुए का भोग जरूर चढ़ाना चाहिए।

कुलदेवी का पूजन:- हर परिवार मे मान्यता अनुसार जो भी कुलदेवी है उनका श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजा अर्चना करना चाहिए।

विसर्जन:- विजयादशमी के दिन समस्त पूजा हवन इत्यादि सामग्री को किसी नदी या जलाशय में विसर्जन करना चाहिए।

पूजा सामग्री:- कुंकुम, सिन्दुर, सुपारी, चावल, पुष्प, इलायची, लौग, पान, दुध, घी, शहद, बिल्वपत्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, इत्र, चौकी, फल, दीप, नैवैध(मिठाई), नारियल आदि।

मंत्र सहित पूजा विधि:- स्वयं को शुद्ध करने के लिए बायें हाथ मे जल लेकर, उसे दाहिने हाथ से ढ़क लें। मंत्रोच्चारण के साथ जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें। 

“ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपिवा।
य: स्मरेत पुंडरीकाक्षं स: बाह्य अभ्यंतर: शुचि॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्ष: पुनातु पुण्डरीकाक्ष पुनातु॥“

आचमन:- तीन बार वाणी, मन व अंत:करण की शुद्धि के लिए चम्मच से जल का आचमन करें। हर एक मंत्र के साथ एक आचमन किया जाना चाहिए।

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।
ॐ अमृताविधानमसि स्वाहा।
ॐ सत्यं यश: श्रीमंयी श्री: श्रयतां स्वाहा।

प्राणायाम:- श्वास को धीमी गति से भीतर गहरी खींचकर थोड़ा रोकना एवं पुन: धीरे-धीरे निकालना प्राणायाम कहलाता है। श्वास खीचते समय यह भावना करे किं प्राण शक्ति एवं श्रेष्ठता सॉस के द्वारा आ रही है एवं छोड़ते समय यह भावना करे की समस्त दुर्गण-दुष्प्रवृतियां, बुरे विचार, श्वास के साथ बाहर निकल रहे है। प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के उपरान्त करें:

ॐ भू: ॐ भुव: ॐ स्व: ॐ मह:।
ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यम।
ॐ तत्सवितुर्ररेण्यं भर्गो देवस्य धीमही धियो यो न: प्रचोदयात।
ॐ आपोज्योतिरसोअमृतं बह्मभुर्भुव स्व: ॐ।

 

 

गणपति पूजन:- लकड़ी के पट्टे या चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर एक थाली रखें। इस थाली में कुंकुम से स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर उस पर पुष्प आसन लगाकर गण अपति की प्रतिमा या फोटो(तस्वीर) स्थापित कर दें या सुपारी पर लाल मौली बांधकर गणेश के रूप में स्थापित करना चाहिए। अब अक्षत, लाल पुष्प(गुलाब), दूर्वा(दुवी) एवं नेवैध गणेश जी पर चढ़ाना चाहिए। जल छोड़ने के पश्चात निम्न मंत्र का 21 बार जप करना चाहिए:-

“ॐ गं गणपतये नम:”

मंत्रोच्चारण के पश्चात अपनी मनोकामना पूर्ती हेतु निम्न मंत्र से प्रार्थना करें:-

विध्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय।
लम्बोदराय सकलाय जगद्विताय॥
नागाननाय श्रुति यज्ञ विभूषिताय।
गौरी सुताय गण नाथ नमो नमस्ते॥
भक्तार्त्तिनाशन पराय गणेश्वराय।
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय॥
विद्याधराय विकटाय च वामनाय।
भक्त प्रसन्न वरदाय नमो नमस्ते॥

संकल्प:- दाहिने हाथ मे जल, कुंकुम, पुष्प, चावल साथ मे ले

“ॐ विष्णु र्विष्णु: श्रीमद्भगवतो विष्णोराज्ञाया प्रवर्तमानस्य, अद्य, श्रीबह्मणो द्वितीय प्ररार्द्धे श्वेत वाराहकल्पे जम्बूदीपे भरत खण्डे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते, मासानां मासोत्तमेमासे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अपने गोत्र का उच्चारण करें) गोत्रोत्पन्न: (अपने नाम का उच्चारण करें) नामा: अहं (सपरिवार/सपत्नीक) सत्प्रवृतिसंवर्धानाय, लोककल्याणाय, आत्मकल्याण्य, ………..(अपनी कामना का उच्चारण करें) कामना सिद्दयर्थे दुर्गा पूजन विद्यानाम तथा साधनाम करिष्ये।“

जल को भूमि पर छोड़ दे। अगर कलश स्थापित करना चाहते है तो अब इसी चौकी पर स्वास्तिक बनाकर बाये हाथ की ओर कोने में कलश(जलयुक्त) स्थापित करें। स्वास्तिक पर कुकंम, अक्षत, पुष्प आदि अर्पित करते हुए कलश स्थापित करें। इस कलश में एक सुपारी कुछ सिक्के, दूब, हल्दी की एक गांठ डालकर, एक नारियल पर स्वस्तिक बनाकर उसके उपर लाल वस्त्र लपेटकर मौली बॉधने के बाद कलश पर स्थापित कर दें। जल का छींटा देकर, कुंकम, अक्षत, पुष्प आदि से नारियल की पूजा करे। वरूण देव को स्मरण कर प्रणाम करे। फिर पुरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण में(कलश मे) बिन्दी लगाए।

दुर्गा सप्तशती मंत्र :

शारदीय नवरात्र आदिशक्ति की पूजा-उपासना का महापर्व होता है, नवरात्र में पूजा के अवसर पर दुर्गासप्तशती का पाठ श्रवण करने से देवी अत्यन्त प्रसन्न होती हैं. सप्तशती का पाठ करने पर उसका सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है. श्रीदुर्गासप्तशती, भगवती दुर्गा का ही स्वरूप है. इस पुस्तक का पाठ करने से पूर्व इस मंत्र द्वारा पंचोपचारपूजन करें-

नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततंनम:। नम: प्रकृत्यैभद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥

यदि  दुर्गासप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हों तो सप्तश्लोकी दुर्गा को पढें. इन सात श्लोकों में सप्तशती का संपूर्ण सार समाहित होता है.

अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

शिव उवाच :

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।

कलौ कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥

देव्युवाच :

श्रृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्ट्साधनम् ।

मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥

विनियोग :

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ॠषिः, अनुष्टुप

छन्दः, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, श्री दुर्गाप्रीत्यथं

सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः ।

1 – ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।

    बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १ ॥

2 – दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः

    स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।

    दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या

    सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ २ ॥

3 – सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

    शरण्ये त्र्यंम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते ॥ ३ ॥

 4 – शरणागतदीनार्तपरित्राणे ।

    सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ॥ ४ ॥

 5 – सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।

    भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ॥ ५ ॥

6 – रोगानशेषानपहंसि तुष्टा

    रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।

    त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां

7 – त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्र्यन्ति ॥ ६ ॥

    सर्वबाधाप्रश्मनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि ।

    एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ७ ॥

     ॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण ॥

नवरात्रके प्रथम दिन कलश (घट) की स्थापना के समय देवी का आवाहन इस प्रकार करें. भक्त प्राय: पूरे नवरात्र उपवास रखते हैं. सम्पूर्ण नवरात्रव्रत के पालन में असमर्थ लोगों के लिए सप्तरात्र,पंचरात्र,युग्मरात्रऔर एकरात्रव्रत का विधान भी है. प्रतिपदा से सप्तमी तक उपवास रखने से सप्तरात्र-व्रत का अनुष्ठान होता है. अष्टमी के दिन माता को हलुवा और चने का भोग लगाकर कुंवारी कन्याओं को खिलाते हैं तथा अन्त में स्वयं प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण (पूर्ण) करते हैं.

नवरात्रके नौ दिन साधना करने वाले साधक प्रतिपदा तिथि के दिन शैलपुत्री की, द्वितीया में ब्रह्मचारिणी, तृतीया में चंद्रघण्टा, चतुर्थी में कूष्माण्डा, पंचमी में स्कन्दमाता, षष्ठी में कात्यायनी, सप्तमी में कालरात्रि, अष्टमी में महागौरी तथा नवमी में सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं. तथा दुर्गा जी के 108 नामों को मंत्र रूप में उसका अधिकाधिक जप करें.

अब एक दूसरी स्वच्छ थाली में स्वस्तिक बनाकर उस पर पुष्प का आसन लगाकर दुर्गा प्रतिमा या तस्वीर या यंत्र को स्थापित करें। अब निम्न प्रकार दुर्गा पूजन करे:-

स्नानार्थ जलं समर्पयामि (जल से स्नान कराए)
स्नानान्ते पुनराचमनीयं जल समर्पयामि (जल चढ़ाए)
दुग्ध स्नानं समर्पयामि (दुध से स्नान कराए)
दधि स्नानं समर्पयामि (दही से स्नान कराए)
घृतस्नानं समर्पयामि (घी से स्नान कराए)
मधुस्नानं समर्पयामि (शहद से स्नान कराए)
शर्करा स्नानं समर्पयामि (शक्कर से स्नान कराए)
पंचामृत स्नानं समर्पयामि (पंचामृत से स्नान कराए)
गन्धोदक स्नानं समर्पयामि (चन्दन एवं इत्र से सुवासित जल से स्नान करावे)
शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि (जल से पुन: स्नान कराए)
यज्ञोपवीतं समर्पयामि (यज्ञोपवीत चढ़ाए)
चन्दनं समर्पयामि (चंदन चढ़ाए)
कुकंम समर्पयामि (कुकंम चढ़ाए)
सुन्दूरं समर्पयामि (सिन्दुर चढ़ाए)
बिल्वपत्रै समर्पयामि (विल्व पत्र चढ़ाए)
पुष्पमाला समर्पयामि (पुष्पमाला चढ़ाए)
धूपमाघ्रापयामि (धूप दिखाए)
दीपं दर्शयामि (दीपक दिखाए व हाथ धो लें)
नैवेध निवेद्यामि (नेवैध चढ़ाए(निवेदित) करे)
ऋतु फलानि समर्पयामि (फल जो इस ऋतु में उपलब्ध हो चढ़ाए)
ताम्बूलं समर्पयामि (लौंग, इलायची एवं सुपारी युक्त पान चढ़ाए)
दक्षिणा समर्पयामि (दक्षिणा चढ़ाए)

इसके बाद कर्पूर अथवा रूई की बाती जलाकर आरती करे।

आरती के नियम:- प्रत्येक व्यक्ति जानकारी के अभाव में अपनी मन मर्जी आरती उतारता रहता है। विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारना चाहिए। चार बार चरणो पर से, दो बार नाभि पर से, एकबार मुख पर से तथा सात बार पूरे शरीर पर से। आरती की बत्तियाँ 1, 5, 7 अर्थात विषम संख्या में ही बत्तियाँ बनाकर आरती की जानी चाहिए।

दुर्गा जी की आरती:-  दुर्गा आरती (DURGA DEVI AARTHI FULL)

प्रदक्षिणा:-

“यानि कानि च पापानी जन्मान्तर कृतानि च।
तानी सर्वानि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥
प्रदक्षिणा समर्पयामि।“

प्रदक्षिणा करें (अगर स्थान न हो तो आसन पर खड़े-खड़े ही स्थान पर घूमे)

क्षमा प्रार्थना:- पुष्प सर्मपित कर देवी को निम्न मंत्र से प्रणाम करे। 

“नमो दैव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।
नम: प्रकृतयै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम॥
या देवी सर्व भूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

ततपश्चात देवी से क्षमा प्रार्थना करे कि जाने अनजाने में कोई गलती या न्यूनता-अधिकता यदि पूजा में हो गई हो तो वे क्षमा करें। इस पूजन के पश्चात अपने संकल्प मे कहे हुए मनोकामना सिद्धि हेतु निम्न मंत्र का यथाशक्ति श्रद्धा अनुसार 9 दिन तक जप करें:-

”ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥“

इस मंत्र के बाद दुर्गा सप्तशती के सभी अध्यायो का पाठ 9 दिन मे पूर्ण करें।

नवरात्री की समाप्ति पर यदि कलश स्थापना की हो तो इसके जल को सारे घर मे छिड़क दें। इस प्रकार पूजा सम्पन्न होती है। यदि कोई व्यक्ति विशेष उपरांकित विधि का पालन करने मे असमर्थ है तो नवरात्रि के दौरान दुर्गा चालीसा का पाठ करें।

दुर्गा सप्तशती की महिमा

मार्कण्डेय पुराण में ब्रह्माजी ने मनुष्यों की रक्षा के लिए परमगोपनीय, कल्याणकारी देवी कवच के पाठ आर देवी के नौ रूपों की आराधना का विधान बताया है, जिन्हें नव दुर्गा कहा जाता है। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक देवी के इन रूपों की साधना उपासना से वांछित फल की प्राप्ति होती है।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता है, क्योंकि यह कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी है। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। यह देवी माहात्म्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है। सप्तशती में कुछ ऐसे भी स्तोत्र एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत्‌ पाठ से वांछित फल की प्राप्ति होती है।

सर्वकल्याण के लिए -

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्येत्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥

बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय॥

आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के लिए

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्‌।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥

 

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श्री शिव मंगलाश्ताकम

Friday, September 16th, 2011

श्री शिव  मंगला अष्टकम  – Sri Shiva Mangalaashtakam

 

भवाय चन्द्रचूडाय निर्गुणाय गुणात्मनॆ ।
कालकालाय रुद्राय नीलग्रीवाय मङ्गलम् ॥ 1 ॥

वृषारूढाय भीमाय व्याघ्रचर्माम्बराय च ।
पशूनाम्पतयॆ तुभ्यं गौरीकान्ताय मङ्गलम् ॥ 2 ॥

भस्मॊद्धूलितदॆहाय नागयज्ञॊपवीतिनॆ ।
रुद्राक्षमालाभूषाय व्यॊमकॆशाय मङ्गलम् ॥ 3 ॥

सूर्यचन्द्राग्निनॆत्राय नमः कैलासवासिनॆ ।
सच्चिदानन्दरूपाय प्रमथॆशाय मङ्गलम् ॥ 4 ॥

मृत्युञ्जयाय साम्बाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणॆ ।
त्रयम्बकाय शान्ताय त्रिलॊकॆशाय मङ्गलम् ॥ 5 ॥

गङ्गाधराय सॊमाय नमॊ हरिहरात्मनॆ ।
उग्राय त्रिपुरघ्नाय वामदॆवाय मङ्गलम् ॥ 6 ॥

सद्यॊजाताय शर्वाय भव्य ज्ञानप्रदायिनॆ ।
ईशानाय नमस्तुभ्यं पञ्चवक्राय मङ्गलम् ॥ 7 ॥

सदाशिव स्वरूपाय नमस्तत्पुरुषाय च ।
अघॊराय च घॊराय महादॆवाय मङ्गलम् ॥ 8 ॥

महादॆवस्य दॆवस्य यः पठॆन्मङ्गलाष्टकम् ।
सर्वार्थ सिद्धि माप्नॊति स सायुज्यं ततः परम् ॥ 9 ॥

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श्री काला हस्तिस्वारा सतकम

Friday, September 16th, 2011

श्री  काला  हस्तिस्वारा  सतकम – Sri Kala Hastiswara Satakam

 

श्रीविद्युत्कलिता‌உजवञ्जवमहा-जीमूतपापाम्बुधा-
रावॆगम्बुन मन्मनॊब्जसमुदी-र्णत्वम्बुं गॊल्पॊयितिन् ।
दॆवा! मी करुणाशरत्समयमिं-तॆं जालुं जिद्भावना-
सॆवं दामरतम्परै मनियेदन्- श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 1 ॥

वाणीवल्लभदुर्लभम्बगु भवद्द्वारम्बुन न्निल्चि नि
र्वाणश्रीं जेऱपट्टं जूचिन विचारद्रॊहमॊ नित्य क
ल्याणक्रीडलं बासि दुर्दशलपा लै राजलॊकाधम
श्रॆणीद्वारमु दूऱञ्जॆसि तिपुडॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 2 ॥

अन्ता मिध्य तलञ्चि चूचिन नरुं डट्लौ टेऱिङ्गिन् सदा
कान्त ल्पुत्रुलु नर्धमुन् तनुवु नि क्कम्बञ्चु मॊहार्णव
चिभ्रान्तिं जेन्दि जरिञ्चु गानि परमार्धम्बैन नीयन्दुं दां
जिन्ताकन्तयु जिन्त निल्पण्डुगदा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 3 ॥

नी ना सन्दोडम्बाटुमाट विनुमा नीचॆत जीतम्बु नॆं
गानिं बट्टक सन्ततम्बु मदि वॆड्कं गोल्तु नन्तस्सप
त्नानीकम्बुन कोप्पगिम्पकुमु नन्नापाटीयॆ चालुं दॆ
जीनोल्लं गरि नोल्ल नोल्ल सिरुलन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 4 ॥

भवकॆलीमदिरामदम्बुन महा पापात्मुण्डै वीडु न
न्नु विवॆकिम्पं डटञ्चु नॆनु नरकार्णॊराशिपालैनं ब
ट्टवु; बालुण्डोकचॊट नाटतमितॊड न्नूतं गूलङ्गं दं
ड्रि विचारिम्पक युण्डुना कटकटा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 5 ॥

स्वामिद्रॊहमुं जॆसि यॆनोकनि गोल्वम्बॊतिनॊ काक नॆ
नीमाट न्विननोल्लकुण्डितिनो निन्नॆ दिक्कुगां जूडनॊ
यॆमी इट्टिवृधापराधिनगु नन्नी दुःखवाराशिवी
ची मध्यम्बुन मुञ्चि युम्पदगुना श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 6 ॥

दिविजक्ष्मा रुह धॆनु रत्न घनभूति प्रस्फुरद्रत्नसा
नुवु नी विल्लु निधीश्वरुण्डु सखुं डर्णॊराशिकन्याविभुं
डुविशॆषार्चकुं डिङ्क नीकेन घनुण्डुं गल्गुनॆ नीवु चू
चि विचारिम्पवु लॆमि नेव्वण्डुडुपुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 7 ॥

नीतॊ युध्धमु चॆय नॊम्पं गविता निर्माणशक्ति न्निनुं
ब्रीतुञ्जॆयगलॆनु नीकोऱकु दण्ड्रिञ्जम्पगाञ्जाल ना
चॆतन् रॊकट निन्नुमोत्तवेऱतुञ्जीकाकु नाभक्ति यॆ
रीतिन्नाकिङ्क निन्नु जूडगलुगन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 8 ॥

आलुम्बिड्डलु दल्लिदण्ड्रुलु धनम्बञ्चु न्महाबन्धनं
बॆला नामेड गट्टिनाडविक निन्नॆवॆलं जिन्तिन्तु नि
र्मूलम्बैन मनम्बुलॊ नेगडु दुर्मॊहाब्धिलॊं ग्रुङ्कि यी
शीलामालपु जिन्त नेट्लुडिपेदॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 9 ॥

निप्पै पातकतूलशैल मडचुन् नीनाममुन् मानवुल्
तप्पन् दव्वुल विन्न नन्तक भुजादर्पॊद्धतक्लॆशमुल्
तप्पुन्दारुनु मुक्तु लौदु रवि शास्त्रम्बुल्महापण्डितुल्
चेप्पङ्गा दमकिङ्क शङ्क वलेना श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 10 ॥

वीडेम्बब्बिन यप्पुडुं दम नुतुल् विन्नप्पुडुम्बोट्टलॊं
गूडुन्नप्पुडु श्रीविलासमुलु पैकोन्नप्पुडुं गायकुल्
पाडङ्ग विनुनप्पुडुन् जेलङ्गु दम्भप्रायविश्राणन
क्रीडासक्तुल नॆमि चेप्पवलेनॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 11 ॥

निनु सॆविम्पग नापदल् वोडमनी नित्यॊत्सवं बब्बनी
जनमात्रुण्डननी महात्मु डननी संसारमॊहम्बु पै
कोननी ज्ञानमु गल्गनी ग्रहगनुल् गुन्दिम्पनी मॆलुव
च्चिन रानी यवि नाकु भूषणमुलॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 12 ॥

ऎ वॆदम्बु बठिञ्चे लूत भुजङ्गं बॆशास्त्रमुल्सूचे दा
नॆ विद्याभ्यसनम्बोनर्चें गरि चेञ्चॆमन्त्र मूहिञ्चे बॊ
धाविर्भावनिदानमुल् चदुवुलय्या! कावु! मीपादसं
सॆवासक्तिये काक जन्तुततिकिन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 13 ॥

कायल् गाचे वधूनखाग्रमुलचॆ गायम्बु वक्षॊजमुल्
रायन् रापडे ऱोम्मु मन्मध विहारक्लॆशविभ्रान्तिचॆ
ब्रायं बायेनु बट्टगट्टे दलचेप्पन् रॊत संसारमॆं
जॆयञ्जाल विरक्तुं जॆयङ्गदवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 14 ॥

निन्नॆरूपमुगा भजिन्तु मदिलॊ नीरूपु मॊकालो स्त्री
चन्नॊ कुञ्चमु मॆकपेण्टिकयो यी सन्दॆहमुल्मान्पि ना
कन्नार न्भवदीयमूर्ति सगुणा कारम्बुगा जूपवॆ
चिन्नीरॆजविहारमत्तमधुपा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 15 ॥

निनु नावाङ्किलि गावुमण्टिनो मरुन्नीलाकाभ्रान्तिं गुं
टेन पोम्मण्टिनो येङ्गिलिच्चि तिनु तिण्टॆङ्गानि कादण्टिनॊ
निनु नेम्मिन्दग विश्वसिञ्चुसुजनानीकम्बु रक्षिम्पञ्जॆ
सिन नाविन्नपमॆल गैकोनवया श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 16 ॥

ऱालन् ऱुव्वगं जॆतुलाडवु कुमारा! रम्मु रम्म्ञ्चुनॆं
जालन् जम्पङ्ग नॆत्रमु न्दिवियङ्गाशक्तुण्डनॆं गानु ना
शीलं बॆमनि चेप्पनुन्नदिङ्क नी चित्तम्बु ना भाग्यमॊ
श्रीलक्ष्मीपतिसॆविताङ्घ्रियुगला! श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 17 ॥

राजुल् मत्तुलु वारिसॆव नरकप्रायम्बु वारिच्चुनं
भॊजाक्षीचतुरन्तयानतुरगी भूषादु लात्मव्यधा
बीजम्बुल् तदपॆक्ष चालु मरितृप्तिं बोन्दितिन् ज्ञानल
क्ष्मीजाग्रत्परिणाम मिम्मु दयतॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 18 ॥

नीरूपम्बु दलम्पङ्गां दुदमोदल् नॆगान नीवैनचॊ
रारा रम्मनि यञ्चुं जेप्पवु पृधारम्भम्बु लिङ्कॆटिकिन्!
नीर न्मुम्पुमु पाल मुम्पु मिङ्क निन्नॆ नम्मिनाण्डं जुमी
श्रीरामार्चित पादपद्मयुगला श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 19 ॥

नीकु न्मांसमु वांछयॆनि कऱवा नीचॆत लॆडुण्डङ्गां
जॊकैनट्टि कुठारमुण्ड ननल ज्यॊतुण्ड नीरुण्डङ्गा
बाकं बोप्प घटिञ्चि चॆतिपुनुकन् भक्षिम्पकाबॊयचॆं
जॆकों टेङ्गिलिमांसमिट्लु दगुना श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 20 ॥

राजै दुष्कृतिं जेन्दें जन्दुरुण्डु राराजै कुबॆरुण्डु दृ
ग्राजीवम्बुनं गाञ्चे दुःखमु कुरुक्ष्मापालुं डामाटनॆ
याजिं गूले समस्तबन्धुवुलतॊ ना राजशब्धम्बु ची
छी जन्मान्तरमन्दु नोल्लनुजुमी श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 21 ॥

राजर्धातुण्डैनचॊ नेचट धर्मम्बुण्डु नॆरीति ना
नाजातिक्रिय लॆर्पडुन् सुखमु मान्यश्रॆणि केट्लब्बु रू
पाजीवालिकि नॆदि दिक्कु धृतिनी भक्तुल् भवत्पादनी
रॆजम्बुल् भजियिन्तु रॆतेऱङ्गुनन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 22 ॥

तरङ्गल् पिप्पलपत्रमुल् मेऱङ्गु टद्दम्बुल् मरुद्दीपमुल्
करिकर्णान्तमु लेण्डमावुल ततुल् खद्यॊत्कीटप्रभल्
सुरवीधीलिखिताक्षरम्बु लसुवुल् ज्यॊत्स्नापःपिण्डमुल्
सिरुलन्दॆल मदान्धुलौदुरु जनुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 23 ॥

निन्नुन्नम्मिन रीति नम्म नोरुलन् नीकन्न नाकेन्नलॆ
रन्नल्दम्मुलु तल्लिदण्ड्रुलु गुरुन्दापत्सहायुन्दु ना
यन्ना! येन्नडु नन्नु संस्कृतिविषादाम्भॊधि दाटिञ्चि य
छ्चिन्नानन्दसुखाब्धिं दॆल्चेदो कदॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 24 ॥

नी पञ्चं बडियुण्डगां गलिगिनन् भिक्षान्नमॆ चालु न्
क्षॆपं बब्बिन राजकीटमुल नॆसॆविम्प्ङ्गानॊप ना
शापाशम्बुलं जुट्टि त्रिप्पकुमु संसारार्धमै बण्टुगां
जॆपट्टं दय गल्गॆनॆनि मदिलॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 25 ॥

नी पॆरुन् भवदङ्घ्रितीर्धमु भवन्निष्ठ्यूत ताम्बूलमुन्
नी पल्लेम्बु प्रसादमुं गोनिकदा नॆ बिड्डनैनाण्ड न
न्नीपाटिं गरुणिम्पु मॊम्प निङ्क नीनेव्वारिकिं बिड्डगां
जॆपट्टं दगुं बट्टि मानं दगदॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 26 ॥

अम्मा यय्य यटञ्चु नेव्वरिनि नॆनन्नन्शिवा! निन्नुनॆ
सुम्मी! नी मदिं दल्लिदण्ड्रुलनटञ्चु न्जूडङ्गाम्बॊकु ना
किम्मैं दल्लियुं दण्ड्रियुन् गुरुण्डु नीवॆ काक संसारपुं
जिम्मञ्जीकण्टि गप्पिन न्गडवु नन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 27 ॥

कोडुकुल् पुट्ट रटञ्चु नॆड्तु रविवॆकुल् जीवनभ्रान्तुलै
कोडुकुल् पुट्टरे कौरवॆन्द्रुन कनॆकुल् वारिचॆ नॆगतुल्
वडसें बुत्रुलु लॆनि या शुकुनकुन् बाटिल्लेनॆ दुर्गतुल्!
चेडुनॆ मॊक्षपदं मपुत्रकुनकुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 28 ॥

ग्रहदॊषम्बुलु दुर्निमित्तमुलु नीकल्याणनामम्बु प्र
त्यहमुं बॆर्कोनुत्तमॊत्तमुल बाधम्बेट्टगानॊपुनॆ?
दहनुं गप्पङ्गञ्जालुनॆ शलभसन्तानम्बु नी सॆवं जॆ
सि हतक्लॆसुलु गारुगाक मनुजुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 29 ॥

अडुगंमॊनिक नन्यमार्गरतुलम्ब्राणावनॊत्साहिनै
यडुगम्बॊयिन मॊदु नीदु पदपद्माराधकश्रॆणियु
न्नेडकु न्निन्नु भजिम्पङ्गाङ्गनियु नाकॆला परापॆक्ष कॊ
रेडि दिङ्कॆमि भवत्प्रसादमे तगुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 30 ॥

मदमातङ्गमु लन्दलम्बुल हरुल् माणिक्यमु ल्पल्लकुल्
मुदितल् चित्रदुकूलमु ल्परिमलम्बु ल्मॊक्षमीञ्जालुनॆ?
मदिलॊ वीनि नपॆक्षसॆसि नृपधामद्वारदॆशम्बुं गा
चि दिनम्बुल् वृधपुत्तुरज्ञुलकटा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 31 ॥

रॊसी रॊयदु कामिनीजनुल तारुण्यॊरुसौख्यम्बुलन्
पासी पायरु पुत्रमित्रजन सम्पद्भ्रान्ति वांछालतल्
कॊसी कॊयदु नामनं बकट नीकुं ब्रीतिगा सत् क्रियल्
चॆसी चॆयदु दीनि त्रुल्लणपवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 32 ॥

एन्नॆल्लुन्दु नॆमि गन्दु निङ्कनॆनेव्वारि रक्षिञ्चेदन्
निन्नॆ निष्ठ भजिञ्चेद न्निरुपमॊन्निद्रप्रमॊदम्बु ना
केन्नण्डब्बेडु न्न्तकालमिङ्क नॆनिट्लुन्न नॆमय्येडिं?
जिन्नम्बुच्चक नन्नु नॆलुकोलवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 33 ॥

चावं गालमु चॆरुवौ टेऱिङ्गियुं जालिम्पङ्गा लॆक न
न्नेवैद्युण्डु चिकित्सं ब्रॊवङ्गलण्डॊ यॆमन्दु रक्षिञ्चुनॊ
ऎ वॆल्पुल् कृपञ्जूतुरॊ यनुचु निन्निन्तैनं जिन्तिम्पण्डा
जीवच्छ्राध्धमुं जॆसिकोन्न यतियुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 34 ॥

दिनमुं जित्तमुलॊ सुवर्णमुखरी तीरप्रदॆशाम्रका
ननमध्यॊपल वॆदिकाग्रमुन नानन्दम्बुनं बङ्कजा
नननिष्थ न्नुनुं जूडं गन्ननदिवॊ सौख्यम्बु लक्ष्मीविला
सिनिमायानटनल् सुखम्बु लगुनॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 35 ॥

आलञ्चु न्मेडं गट्टि दानिकि नवत्यश्रॆणिं गल्पिञ्चि त
द्भालव्रातमु निच्चिपुच्चुटनु सम्बन्धम्बु गाविञ्चि या
मालर्मम्बुन बान्धवं बनेडि प्रॆमं गोन्दऱं द्रिप्पङ्गां
सीलन्सील यमर्चिन ट्लोसङ्गितॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 36 ॥

तनुवॆ नित्यमुगा नोनर्चु मदिलॆदा चच्चि जन्मिम्पकुं
ड नुपायम्बु घटिम्पु मागतुल रेण्ट न्नॆर्पु लॆकुन्न लॆ
दनि नाकिप्पुड चेप्पु चॆयङ्गल कार्यम्बुन्न संसॆवं जॆ
सि निनुं गाञ्चेदङ्गाक कालमुननॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 37 ॥

पदुनाल्गॆले महायुगम्बु लोक भूपालुण्डु; चेल्लिञ्चे न
य्युदयास्ताचलसन्धि नाज्ञ नोकं डायुष्मन्तुण्डै वीरिय
भ्युदयं बेव्वरु चेप्पङ्गा विनरो यल्पुल्मत्तुलै यॆल च
च्चेदरॊ राजुल मञ्चु नक्कटकटा! श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 38 ॥

राजन्नन्तने पॊवुना कृपयु धर्मम्बाभिजात्यम्बु वि
द्याजातक्षम सत्यभाषणमु विद्वन्मित्रसंरक्षयुन्
सौगन्यम्बु कृतम्बेऱुङ्गटयु विश्वासम्बु गाकुन्न दु
र्बीजश्रॆष्थुलु गां गतम्बु गलदॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 39 ॥

मुनु नीचॆ नपवर्गराज्यपदवी मूर्धाभिषॆकम्बु गां
चिन पुण्यात्मुलु नॆनु नोक्कसरिवॊ चिन्तिञ्चि चूडङ्ग ने
ट्लनिनं गीटफणीन्द्रपॊतमदवॆ दण्डॊग्रहिंसाविचा
रिनि गाङ्गां निनु गानङ्गाक मदिलॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 40 ॥

पवमानाशनभूषणप्रकरमुन् भद्रॆभचर्मम्बु ना-
टविकत्वम्बुं प्रियम्बुलै भुगहशुण्डालातवीचारुलन्
भवदुःखम्बुलं बापु टोप्पुं जेलन्दिम्बाटिञ्चि कैवल्यमि-
च्चि विनॊदिञ्चुट कॆमि कारणमया श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 41 ॥

अमरस्त्रील रमिञ्चिनं जेडदु मॊहं बिन्तयुन् ब्रह्मप-
ट्टमु सिध्धिञ्चिन नास दीऱदु निरूढक्रॊधमुन् सर्वलॊ-
कमुल न्म्रिङ्गिन मान दिन्दुं गल सौ-ख्यं बोल्ल नीसॆवं जॆ-
सि महापातकवारिराशिं गडतुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 42 ॥

चनुवारिं गनि यॆद्चुवारु जमुण्डा सत्यम्बुगा वत्तु मॆ
मनुमानम्बिङ्क लॆदु नम्ममनि तारावॆल नारॆवुनन्
मुनुङ्गम्बॊवुचु बास सॆयुट सुमी मुम्माटिकिं जूडगां
जेनटु ल्गानरु दीनिभावमिदिवॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 43 ॥

भवदुःखम्बुलु राजकीटमुल नॆब्रार्धिञ्चिनं बायुनॆ
भवदङ्घ्रिस्तुतिचॆतङ्गाक विलसद्बालक्षुधाक्लॆशदु
ष्टविधुल्मानुने चूड मॆङ्कमेडचण्टन्दल्लि कारुण्यद्ब
ष्थिविशॆषम्बुन निच्चि चण्टम्बले नॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 44 ॥

पवि पुष्पम्बगु नग्नि मञ्चगु नकूपारम्बु भूमीस्थलं
बवु शत्रुं डतिमित्रुण्डौ विषमु दिव्याहारमौ नेन्नङ्गा
नवनीमण्डलिलॊपलन् शिव शिवॆ त्याभाषणॊल्लासिकिन्
शिव नी नाममु सर्ववश्यकरमौ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 45 ॥

लॆवॊ कानलं गन्धमूलफलमुल् लॆवॊ गुहल् तॊयमुल्
लॆवॊ यॆऱुलं बल्लवास्तरणमुल् लॆवॊ सदा यात्मलॊ
लॆवॊ नीवु विरक्तुल न्मनुप जालिं बोन्दि भूपालुरन्
सॆवल् सॆयङ्गं बॊदु रॆलोको जनुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 46 ॥

मुनु नॆं बुट्टिन पुट्टु लेन्नि गलवॊ मॊहम्बुचॆ नन्दुञ्जॆ
सिन कर्मम्बुल प्रॊवु लेन्नि गलवॊ चिन्तिञ्चिनन् गान नी
जननम्बॆ यनि युन्न वाड निदियॆ चालिम्पवॆ निन्नुं गो
ल्चिन पुण्यम्बुनकुं गृपारतुण्डवै श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 47 ॥

तनु वेन्दाक धरित्रि नुण्डु ननु नन्दाकन् महारॊगदी
पनदुःखादुलं बोन्दकुण्ड ननुकम्पादृष्टि वीक्षिञ्चि या
वेनुकन् नीपदपद्ममुल् दलञ्चुचुन् विश्वप्रपञ्चम्बुं बा
सिन चित्तम्बुन नुण्डञ्जॆयङ्गदवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 48 ॥

मलभूयिष्ट मनॊजधाममु सुषुम्नाद्वारमॊ यारु कुं
डलियॊ पादकराक्षियुग्मम्बुलु षट्कञ्जम्बुलॊ मॊमु दा
जलजम्बॊ निटलम्बु चन्द्रकलयॊ सङ्गम्बु यॊगम्बो गा
सिलि सॆविन्तुरु कान्तलन् भुवि जनुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 49 ॥

जलकम्बुल् रसमुल् प्रसूनमुलु वाचाबन्धमुल् वाद्यमु
ल्कलशब्धध्वनु लञ्चिताम्बर मलङ्कारम्बु दीप्तु ल्मेऱुं
गुलु नैवॆद्यमु माधुरी महिमगां गोल्तुन्निनुन् भक्तिरं
जिल दिव्यार्चन गूर्चि नॆर्चिन क्रियन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 50 ॥

ऎलील न्नुतियिम्पवच्चु नुपमॊत्प्रॆक्षाध्वनिव्यङ्ग्यश
ब्धालङ्कारविशॆषभाषल कलभ्यम्बैन नीरूपमुं
जालुञ्जालुं गवित्वमुल्निलुचुनॆ सत्यम्बु वर्णिञ्चुचॊ
ची! लज्जिम्परुगाक मादृशकवुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 51 ॥

पालुं बुव्वयुं बेट्टेदं गुडुवरा पापन्न रा यन्न लॆ
लॆलेम्मन्न नरण्टिपण्ड्लुं गोनि तॆलॆकुन्न नॆनोल्लनं
टॆ लालिम्परॆ तल्लिदण्ड्रुलपु डट्लॆ तेच्चि वात्सल्य ल
क्ष्मीलीलावचनम्बुलं गुडुपरा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 52 ॥

कललञ्चुन् शकुनम्बुलञ्चु ग्रहयॊगं बञ्चु सामुद्रिकं
बु लटञ्चुं देवुलञ्चु दिष्ट्मनुचुन् भूतम्बुलञ्चु न्विषा
दुलटञ्चु न्निमिषार्ध जीवनमुलञ्चुं ब्रीतिं बुट्टिञ्चि यी
सिलुगुल् प्राणुलकेन्नि चॆसितिवया श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 53 ॥

तलमीन्दं गुसुमप्रसाद मलिकस्थानम्बुपै भूतियुन्
गलसीमम्बुन दण्ड नासिकतुदन् गन्धप्रसारम्बु लॊ
पल नैवॆद्यमुं जॆर्चु नॆ मनुज्ं डाभक्तुण्डु नीकेप्पुडुं
जेलिकाडै विहरिञ्चु रौप्यगिरिपै श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 54 ॥

आलुं बिड्डलु मित्रुलुन् हितुलु निष्टर्धम्बु लीनॆर्तुरॆ
वॆल न्वारि भजिम्पं जालिपड काविर्भूत मॊदम्बुनं
गालम्बेल्ल सुखम्बु नीकु निङ्क भक्तश्रॆणि रक्षिम्पकॆ
श्रीलेव्वारिकिं गूडम्बेट्टेदवया श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 55 ॥

सुलभुल्मूर्खु लनुत्तमॊत्तमुल राजुल्गल्गियॆवॆल न
न्नलन्तलबेट्टिन नी पदाब्धमुलं बायञ्जाल नॆमिच्चिनं
गलधौताचल मॆलु टम्बुनिधिलॊं गापुण्डु टब्जम्बु पैं
जेलुवोप्पुन् सुखियिम्पं गाञ्चुट सुमी श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 56 ॥

कलधौताद्रियु नस्थिमालिकयु गॊगन्धर्वमुन् बुन्कयुं
बुलितॊलु न्भसितम्बुं बाम्पतोदवुल् पॊकुण्डं दॊम्बुट्लकै
तोलि नॆवारलतॊडं बुट्टक कलादुल्गल्गे मॆलय्येना
सिलुवुल्दूरमुचॆसिकों टेऱिङ्गियॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 57 ॥

श्रुतुलभ्यासमुचॆसि शास्त्रगरिमल् शॊधिञ्चि तत्त्वम्बुलन्
मति नूहिञ्चि शरीर मस्थिरमु ब्रह्मम्बेन्न सत्यम्बु गां
चिति मञ्चुन् सभलन् वृधावचनमु ल्चेप्पङ्गनॆ कानि नि
र्जितचित्तस्थिर सौख्यमुल् देलियरॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 58 ॥

गति नीवञ्चु भजिञ्चुवार लपवर्गं बोन्दगानॆल सं
ततमुं गूटिकिनै चरिम्प विनलॆदा ’यायु रन्नं प्रय
च्छति’ यञ्चुन्मोऱवेट्टगा श्रुतुलु संसारान्धकाराभि दू
षितदुर्मार्गुल् गानं गानम्बडवॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 59 ॥

रतिरा जुद्धति मीऱ नोक्कपरि गॊराजाश्वुनि न्नोत्तं बॊ
नतं डादर्पकु वॆग नोत्त गवयं बाम्बॊतुनुं दाङ्कि यु
ग्रतं बॊराडङ्गनुन्न युन्नडिमि लॆङ्गल्वॊले शॊकानल
स्थितिपालै मोऱपेट्टुनन् मनुपवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 60 ॥

अन्ता संशयमॆ शरीरघटनम्बन्ता विचारम्बे लॊ
नन्ता दुःखपरम्परानिवितमे मॆनन्ता भयभ्रान्तमॆ
यन्तानन्तशरीरशॊषणमे दुर्व्यापारमॆ दॆहिकिन्
जिन्तन् निन्नुं दलञ्चि पोन्दरु नरुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 61 ॥

सन्तॊषिञ्चितिनिं जालुञ्जालु रतिराजद्वारसौख्यम्बुलन्
शान्तिन् बोन्दितिं जालुञ्जालु बहुराजद्वारसौख्यम्बुलन्
शान्तिं बोन्देदं जूपु ब्रह्मपदराजद्वारसौख्यम्बु नि
श्चिन्तन् शान्तुण्ड नौदु नी करुणचॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 62 ॥

स्तॊत्रं बन्युलं जॆयनोल्लनि व्रतस्थुल्वॊले वॆसम्बुतॊं
बुत्री पुत्र कलत्र रक्षण कलाबुध्धिन् नृपाला(अ)धमन्
बात्रं बञ्चु भजिम्पम्बॊदु रितियुन् भाष्यम्बे यिव्वारिचा
रित्रं बेन्नण्डु मेच्च नेञ्च मदिलॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 63 ॥

अकलङ्कस्थिति निल्पि नाड मनु घण्टा(आ)रावमुन् बिन्दुदी
पकलाश्रॆणि विवॆकसाधनमुलोप्पन् बूनि यानन्दता
रकदुर्गाटविलॊ मनॊमृगमुगर्वस्फूर्ति वारिञ्चुवा
रिकिङ्गा वीडु भवॊग्रबन्धलतिकल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 64 ॥

ओकयर्धम्बु निन्नु नॆ नडुगङ्गा नूहिञ्चि नेट्लैनं बो
म्मु कवित्वम्बुलु नाकुं जेन्दनिवि यॆमॊ यण्टिवा नादुजि
ह्वकु नैसर्गिक कृत्य मिन्तिय सुमी प्रार्धिञ्चुटॆ कादु कॊ
रिकल न्निन्नुनुगान नाकु वशमा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 65 ॥

शुकमुल् किंशुकपुष्पमुल् गनि फलस्तॊमं बटञ्चुन्समु
त्सुकतं दॆरङ्गं बॊवु नच्चट महा दुःखम्बु सिद्धिञ्चुं; ग
र्मकलाभाषलकेल्लं ब्रापुलगु शास्त्रम्बु ल्विलॊकिञ्चुवा
रिकि नित्यत्वमनीष दूरमगुञ्जू श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 66 ॥

ओकरिं जम्पि पदस्थुलै ब्रतुकं दामोक्कोक्क रूहिन्तुरॆ
लोको तामेन्नण्डुं जावरॊ तमकुं बॊवॊ सम्पदल् पुत्रमि
त्रकलत्रादुलतॊड नित्य सुखमन्दं गन्दुरॊ युन्नवा
रिकि लॆदॊ मृति येन्नण्डुं गटकट श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 67 ॥

नी कारुण्यमुं गल्गिनट्टि नरुं डॆनीचालयम्बुल जोरं
डॆकार्पण्यपु माटलाड नरुगं डेव्वारितॊ वॆषमुल्
गैकॊडॆ मतमुल् भजिम्पं डिलनॆकष्टप्रकारम्बुलन्
जीकाकै चेडिपॊन्दु जीवनदशन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 68 ॥

ज्ञातुल् द्रॊहम्बु वाण्ड्रु सॆयुकपटॆर्यादि क्रियादॊषमुल्
मातण्ड्रान सहिम्परादु प्रतिकर्मम्बिञ्चुकॆ जॆयगां
बॊतॆ दॊसमु गान मानि यतिनै पॊङ्गॊरिनन् सर्वदा
चॆतःक्रॊधमु मान देट्लु नडुतुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 69 ॥

चदुवुल् नॆर्चिन पण्डिताधमुलु स्वॆच्छाभाषणक्रीडलन्
वदरन् संशयभीकराटवुलं द्रॊवल्दप्पि वर्तिम्पङ्गा
मदनक्रॊधकिरातुलन्दुं गनि भीमप्रौढिचॆं दाङ्किनं
जेदरुं जित्तमु चित्तगिम्पङ्गदवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 70 ॥

रॊसिं दॆण्टिदि रॊन्त दॆण्टिदि मनो रॊगस्थुण्डै दॆहि तां
बूसिन्दॆण्टिदि पून्त लॆण्टिवि मदा(अ)पूतम्बु ली दॆहमुल्
मूसिन्दॆण्टिदि मून्तलॆण्टिवि सदामूढत्वमॆ कानि तां
जॆसिन्दॆण्टिदि चॆन्तलॆण्टिवि वृधा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 71 ॥

श्री शैलॆशु भजिन्तुनॊ यभवुङ्गाञ्ची नाधु सॆविन्तुनॊ
काशीवल्लभुं गोल्वम्बॊदुनो महा कालॆशुं बूजिन्तुनॊ
नाशीलं बणुवैन मॆरु वनुचुन् रक्षिम्पवॆ नी कृपा
श्री शृङ्गारविलासहासमुलचॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 72 ॥

अयवारै चरियिम्पवच्चुं दन पादां(अ)भॊजतीर्धम्बुलन्
दयतॊं गोम्मनवच्चु सॆवकुनि यर्धप्राणदॆहादुल
न्नियु ना सोम्मनवच्चुङ्गानि सिरुलन्निन्दिञ्चि निन्नात्मनि
ष्क्रियतं गानङ्गरादु पण्डितुलकुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 73 ॥

माया(अ) जाण्डकरण्डकॊटिं बोडिगामर्धिञ्चिरॊ विक्रमा(अ)
जॆयुं गायजुं जम्पिरॊ कपटलक्ष्मी मॊहमुं बासिरॊ
यायुर्दयभुजङ्गमृत्युवु ननायासम्बुनन् गेल्चिरॊ
श्रॆयॊदायक् लौदु रेट्टु लितरुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 74 ॥

चविगां जूड विनङ्ग मूर्कोनं दनूसङ्घर्षणास्वादमों
द विनिर्मिञ्चेद वॆल जन्तुवुल नॆतत्क्रीडलॆ पातक
व्यवहारम्बलु सॆयुनॆमिटिकि मायाविद्यचॆ ब्रोद्दुपु
च्चि विनॊदिम्पङ्ग दीन नॆमि फलमॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 75 ॥

वेनुक्ं जॆसिन घॊरदुर्दशलु भाविम्पङ्ग रॊन्तय्येडुन्
वेनुकन् मुन्दट वच्चु दुर्मरणमुल् वीक्षिम्प भीतय्येडुन्
ननु नॆञ्जूडग नाविधुल्दलञ्चियुन् नाकॆ भयं बय्येडुं
जेनकुञ्जीङ्कटियायें गालमुनकुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 76 ॥

परिशीलिञ्चिति मन्त्रतन्त्रमुलु चेप्प न्विण्टि साङ्ख्यादियॊ
ग रहस्यम्बुलु वॆद शास्त्रमुलु वक्काणिञ्चितिन् शङ्कवॊ
दरयं गुम्मडिकायलॊनि यवगिञ्जन्तैन नम्मिच्ञ्चि सु
स्थिरविज्ञानमु त्रॊवं जेप्पङ्गदवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 77 ॥

मोदलं जॆसिनवारि धर्ममुलु निर्मूलम्बुगां जॆसि दु
र्मदुलै यिप्पुडु वारे धर्ममु लोनर्पं दम्मु दैवम्बु न
व्वडे रानुन्न दुरात्मुलेल्ल दमत्रॊवं बॊवरॆ ऎल चॆ
सेदरॊ मीन्दु दलञ्चिचूड कधमुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 78 ॥

कासन्तैन सुखं बोनर्चुनो मनःकामम्बु लीडॆर्चुनॊ
वीसम्बैननु वेण्टवच्चुनो जगद्विख्यातिं गाविञ्चुनॊ
दॊसम्बु ल्बेडं बोपुनॊ वलसिनन्दॊड्तॊ मिमुं जूपुनॊ
छी! संसारदुराश यॆलुदुपवॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 79 ॥

ओकपूण्टिञ्चुक कूड तक्कुवगुनॆ नॊर्वङ्गलॆं डेण्डकॊ
पक नीडन्वेदकुं जलिं जडिचि कुम्पट्लेत्तुकॊञ्जूचु वा
नकु निण्डिण्ड्लुनु दूऱु नीतनुवु दीनन्वच्चु सौख्यम्बु रॊ
सि कडासिम्परुगाक मर्त्वुलकट श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 80 ॥

कॆदारादिसमस्ततीर्धमुलु कॊर्मिञ्जूडं बॊनॆण्टिकिन्
गाडा मुङ्गिलि वारणासि! कडुपॆ कैलासशैलम्बु मी
पादध्यानमु सम्भविञ्चुनपुडॆ भाविम्प नज्ञानल
क्ष्मीदारिद्र्युलु गारे लॊकु लकटा! श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 81 ॥

तमकों बोप्पं बराङ्गनाजनपर द्रव्यम्बुलन् म्रुच्चिलं
ग महॊद्यॊगमु सॆयनेम्मनमुदोङ्गं बट्टि वैराग्यपा
शमुलं जुट्टि बिगिमञ्चि नीदुचरण स्तम्भञ्जुनं गट्टिवै
चि मुदं बेप्पुडुं गल्गञ्जॆय गडवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 82 ॥

वॆधं दिट्टगरादुगानि भुविलॊ विद्वांसुलञ्जॆय नॆ
ला धीचातुरिं जॆसें जॆसिन गुलामापाटनॆ पॊक क्षु
द्बाधादुल् गलिगिम्पनॆल यदि कृत्यम्बैन दुर्मार्गुलं
जी! धात्रीशुलं जॆयनॆण्टि ककटा! श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 83 ॥

पुडमि न्निन्नोक बिल्वपत्रमुननॆं बूजिञ्चि पुण्यम्बुनुं
बडयन्नॆरक पेक्कुदैवमुलकुं बप्पुल् प्रसादम्बुलं
गुडुमुल् दॊसेलु सारेसत्तुलडुकुल् गुग्गिल्लुनुं बॆट्टुचुं
जेडि येन्दुं गोऱगाकपॊदु रकटा! श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 84 ॥

वित्तज्ञानमु पादु चित्तमु भवावॆशम्बु रक्षाम्बुवुल्
मत्तत्वम्बु तदङ्कुरम् ऐनृतमुल् माऱाकु लत्यन्तदु
द्वृत्तुल् पुव्वुलुं बण्ड्लु मन्मधमुखा विर्भूतदॊषम्बुलुं
जित्ताध्युन्नतनिम्बभूजमुनकुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 85 ॥

नीपैं गाप्यमु चेप्पुचुन्न यतण्डुन्नीपद्यमुल् व्रासियि
म्मा पाठंमोनरिन्तुनन्न यतण्डुन् मञ्जुप्रबन्धम्बु नि
ष्टापूर्तिं बठियिञ्चुचुन्न यतण्डुन् सद्बान्धवुल् गाक ची
ची! पृष्ठागतबान्धवम्बु निजमा! श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 86 ॥

सम्पद्गर्वमुं बाऱन्द्रॊलि रिपुलन् जङ्किञ्चि याकाङ्क्षलन्
दम्पुल्वेट्टि कलङ्कमु ल्नऱकि बन्धक्लॆशदॊषम्बुलं
जिम्पुल्सॆसि वयॊविलासमुलु सङ्क्षॆपिञ्चि भूतम्बुलं
जेम्पल्वॆयक निन्नुं गाननगुना श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 87 ॥

राजश्रॆणिकि दासुलै सिरुलं गॊरं जॆरङ्गा सौख्यमॊ
यी जन्मम्बु तरिम्पञ्जॆयगल मिम्मॆ प्रोद्दु सॆविञ्चु नि
र्व्याजाचारमु सौख्यमॊ तेलियलॆरौ मानवु ल्पापरा
जीजातातिमदान्धबुद्धु लगुचुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 88 ॥

निन्नं जूडरो मोन्नं जूडरॊ जनुल् नित्यम्बु जावङ्ग ना
पन्नु ल्गन्ननिधान मय्येडि धनभ्रान्तिन् विसर्जिम्पलॆ
कुन्ना रेन्नण्डु निन्नु गण्डु रिक मर्त्वुल् गोल्वरॆमॊ निनुन्
विन्नं बॊवक यन्यदैवरतुलन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 89 ॥

नन्नॆ येनुङ्गुतॊलुदुप्पटमु बुव्वाकालकूतम्बु चॆ
गिन्नॆ ब्रह्मकपाल मुग्रमगु भॊगॆ कण्ठहारम्बु मॆल्
निन्नीलागुन नुण्टयुं देलिसियुन् नीपादपद्मम्बु चॆ
र्चेन् नारयणुं डेट्लु मानसमुं दा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 90 ॥

द्वारद्वारमुलन्दुं जञ्चुकिजनव्रातम्बु दण्डंमुलन्
दॊरन्त्स्थलि बग्गनं बोडुचुचुन् दुर्भाषलाड न्मऱिन्
वारिं ब्रार्धनचॆसि राजुलकु सॆवल्सॆयङ्गाम्बॊरुल
क्ष्मीराज्यम्बुनु गॊरि नीमरिजनुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 91 ॥

ऊरूरं जनुलेल्ल बिक्ष मिदरॊयुन्दं गुहल्गल्गवॊ
चीरानीकमु वीधुलं दोरुकरॊ शीतामृतस्वच्छवाः
पूरं बॆरुलं बाऱदॊ तपसुलम्ब्रॊवङ्ग नीवॊपवॊ
चॆरं बॊवुदुरॆल रागुल जनुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 92 ॥

दय जूडुण्डनि गोन्दऱाडुदुरु नित्यम्बुन् निनुं गोल्चुचुन्
नियमं बेन्तॊ फलम्बु नन्तियेकदा नीवीय पिण्डेन्तॊ अं
तियका निप्पटियुं दलम्पननु बुद्धिं जूड; नॆलब्बुनि
ष्क्रियतन् निन्नु भजिम्प किष्टसुखमुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 93 ॥

आरावं बुदयिञ्चें दारकमुग नात्माभ्रवीधिन्महा(अ)
कारॊकारमकारयुक्तमगु नॊङ्काराभिधानम्बु चे
न्नारुन् विश्व मनङ्गं दन्महिमचॆ नानादबिन्दुल् सुख
श्री रञ्जिल्लं गडङ्गु नीवदे सुमी श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 94 ॥

नीभक्तु ल्मदिवॆल भङ्गुल निनुन्सॆविम्बुचुन् वॆडङ्गा
लॊभम्बॆटिकि वारि कॊर्कुलु कृपलुत्वम्बुनं दीर्मरा
दा भव्यम्बुं दलञ्चि चूडु परमार्धं बिच्चि पोम्मन्न नी
श्री भाण्डरमुलॊं गोऱन्तपडुना श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 95 ॥

मोदलन्भक्तुलकिच्चिनाण्डवुगदा मॊक्षम्बु नॆं डॆमया
’मुदियङ्गा मुदियङ्गं बुट्टु घनमौ मॊहम्बु लॊभम्बु’ न
न्नदि सत्यम्बु कृपं दलम्प नोकवुण्यात्मुण्डु निन्नात्म गो
ल्चि दिनम्बुन् मोऱवेट्टङ्गां गटगटा! श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 96 ॥

कालद्वारकवाटबन्धनमु दुष्काल्प्रमाणक्रिया
लॊलाजालकचित्रगुप्तमुखव ल्मीकॊग्रजिह्वाद्भुत
व्यलव्यालविरॊधि मृत्युमुखदंष्ट्रा(अ)हार्य वज्रम्बु दि
क्चॆलालङ्कृत! नीदुनाम मरयन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 97 ॥

पदिवॆललैननु लॊककण्टकुलचॆं ब्राप्रिञ्चु सौख्यम्बु ना
मदिकिं बथ्यमु गादु सर्वमुनकुन् मध्यस्थुण्डै सत्यदा
नदयादुल् गल राजु नाकोसङ्गु मॆनव्वानि नी यट्लचू
चि दिनम्बुन् मुदमोन्दुदुन् गडपटन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 98 ॥

तातल् तल्लियुं दण्ड्रियुन् मऱियुं बेद्दल् चावगां जूडरॊ
भीतिं बोन्दङ्गनॆल चावुनकुङ्गां बेण्ड्लामुबिड्डल् हित
व्रातम्बुन् बलविम्प जन्तुवुलकुन् वालायमैयुण्डङ्गां
जॆतॊवीधि नरुण्डु निन्गोलुवण्डॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 99 ॥

जातुल् सेप्पुट सॆवसॆयुट मृषल् सन्धिञ्चु टन्यायवि
ख्यातिं बोन्दुट कोण्डेकाण्डवुट हिंसारम्भकुण्डौट मि
ध्यातात्पर्यमुलाडुटन्नियुं बरद्रव्यम्बुनाशिञ्चि यी
श्री ता नेन्नियुगम्बु लुण्डङ्गलदॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 100 ॥

चेडुगुल् कोन्दऱु कूडि चॆयङ्गम्बनुल् चीकट्लु दूऱङ्गं मा
ल्पडितिं गान ग्रहिम्परानि निनु नोल्लञ्जालं बोम्मञ्चु निल्
वेलन्द्रॊचिनं जूरुपट्टुकोनि नॆ व्रॆलाडुदुं गॊर्किं गॊ
रेडि यर्धम्बुलु नाकु नॆल यिडवॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 101 ॥

भसितॊद्धूलनधूसराङ्गुलु जटाभारॊत्तमाङ्गुल् तपॊ
व्यसनमुल् साधितपञ्चवर्णरसमुल् वैराग्यवन्तुल् नितां
तसुखस्वान्तुलु सत्यभाषणलु नुद्यद्रत्नरुद्राक्षरा
जिसमॆतुल् तुदनेव्वरैन गोलुतुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 102 ॥

जलजश्री गल मञ्चिनील्लु गलवाचत्रातिलॊ बापुरॆ!
वेलिवाड न्मऱि बाम्पनिल्लुगलदावॆसालुगा नक्कटा!
नलि ना रेण्डु गुणम्बु लेञ्चि मदिलॊ नन्नॆमि रॊयङ्ग नी
चेलुवम्बैन गुणम्बु लेञ्चुकोनवॆ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 103 ॥

गडियल् रेण्टिको मूण्टिकॊ गडियकॊ कादॆनि नॆण्डेल्लियॊ
कड नॆण्डादिको येन्नण्डॊ येऱुं ग मीकायम्बु लीभूमिपैं
बडगा नुन्नवि धर्ममार्गमोकटिं बाटिम्प री मानवुल्
चेडुगुल् नीपदभक्तियुं देलियरॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 104 ॥

क्षितिलॊ दोड्डतुरङ्गसामजमु लॆचित्रम्मु लान्दॊलिका
ततु लॆ लेक्क विलासिनीजनसुवस्रव्रात भूषाकला
पतनूजादिक मॆमिदुर्लभमु नी पादम्मु लर्चिञ्चुचॊ
जितपङ्कॆरुहपादपद्मयुगला श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 105 ॥

सलिलम्मुल् जुखुकप्रमाण मोक पुष्मम्मुन् भवन्मौलि नि
श्चलबक्तिप्रपत्तिचॆ नरुण्डु पूजल् सॆयङ्गा धन्युण्डौ
निल गङ्गाजलचन्द्रखण्डमुल दानिन्दुं दुदिं गाञ्चु नी
चेलुवं बन्तयु नी महत्त्व मिदिगा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 106 ॥

तमनॆत्रद्युतिं दामे चूड सुखमैतादात्म्यमुन् गूर्पङ्गा
विमलम्मुल् कमलाभमुल् जितलसद्विद्युल्लतालास्यमुल्
सुमनॊबाणजयप्रदम्मुलनुचुन् जूचुन् जनम्बूनिहा
रिमृगाक्षीनिवहम्मुकन्नुगवलन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 107 ॥

पटवद्रज्जुभुजङ्गवद्रजतवि भ्रान्तिस्फुरच्छुक्तिव
द्घटवच्चन्द्रशिलाजपाकुसुमरु क्साङ्गत्यवत्तञ्चुवा
क्पटिमल् नॆर्तुरु चित्सुखं बनुभविम्पन् लॆक दुर्मॆधनुल्
चिटुकन्नं दलपॊयञ्जूतु रधमुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 108 ॥

निनु निन्दिञ्चिन दक्षुपैं देगवो वाणीनाधु शासिम्पवॊ
चनुना नी पादपद्मसॆवकुलं दुच्छं बाडु दुर्मार्गुलं
बेनुपन् नीकुनु नीदुभक्तततिकिन् भॆदम्बु गानङ्ग व
च्चेनो लॆकुण्डिन नूऱकुण्डगलवा श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 109 ॥

करिदैत्युन् बोरिगोन्न शूलमु क(रा)रग्र(स्थ)स्तम्बु गादॊ रती
श्वरुनिन् गाल्चिन फाललॊचनशिखा वर्गम्बु चल्लाऱेनॊ
परनिन्दापरुलन् वधिम्प विदियुन् भाष्यम्बे वारॆमि चॆ
सिरि नीकुन् बरमॊपकार मरयन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 110 ॥

दुरमुन् दुर्गमु रायबारमु मऱिन् दोङ्गर्ममुन् वैद्यमुन्
नरनाधाश्रय मॊडबॆरमुनु बेन्मन्त्रम्बु सिद्धिञ्चिनन्
अरयन् दोड्डफलम्बु गल्गुनदिगा काकार्यमॆ तप्पिनन्
सिरियुं बॊवुनु ब्राणहानियु नगुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 111 ॥

तनयुं गाञ्चि धनम्बु निञ्चि दिविजस्थानम्बु गट्टिञ्चि वि
प्रुन कुद्वाहमु जॆसि सत्कृतिकिं बात्रुण्डै तटाकम्बु नॆ
र्पुनं द्रव्विञ्चि वनम्बु वेट्टि मननी पॊलॆडु नीसॆवं जॆ
सिन पुण्यात्मुण्डु पॊवु लॊकमुनकुन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 112 ॥

क्षितिनाधॊत्तम! सत्कवीश्वरुण्ड् वच्चेन् मिम्मुलं जूडङ्गा
नतण्डॆ मॆटि कवित्ववैखरिनि सद्यःकाव्यनिर्मात तत्
प्रतिभ ल्मञ्चिनि तिट्टुपद्यमुलु चेप्पुं दातण्डैनन् ममुं
ग्रितमॆ चूचेनु बोम्मटञ्चु रधमुल् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 113 ॥

नीकुं गानि कवित्व मेव्वरिकि नॆनीनञ्चु मीदेत्तितिन्
जॆकोण्टिन् बिरुदम्बु कङ्कणमु मुञ्जॆं गट्टितिं बट्टितिन्
लॊकुल् मेच्च व्रतम्बु नातनुवु कीलुल् नॆर्पुलुं गावु छी
छी कालम्बुलरीति दप्पेडु जुमी श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 114 ॥

निच्चल् निन्नु भजिञ्चि चिन्मयमहा निर्वाणपीठम्बु पै
रच्चल्सॆयक यार्जवम्बु कुजन व्रातम्बुचॆं ग्राङ्गि भू
भृच्चण्डालुरं गोल्चि वारु दनुं गॊपिंमन् बुधुं डार्तुण्डै
चिच्चारं जमु रेल्लं जल्लुकोनुनॊ श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 115 ॥

दन्तम्बु ल्पडनप्पुडॆ तनुवुनन्दारूढि युन्नप्पुडॆ
कान्तासङ्घमु रॊयनप्पुडॆ जरक्रान्तम्बु गानप्पुडॆ
वितल्मॆन जरिञ्चनप्पुडे कुरुल्वेल्लेल्ल गानप्पुडॆ
चिन्तिम्पन्वले नीपदाम्बुजमुलन् श्री कालहस्तीश्वरा! ॥ 116 ॥

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शिवमहिम्नस्तॊत्रम्

Saturday, September 10th, 2011

  

श्री शिव महिम्ना स्तोत्रम  – Sri Shiva Mahimna Stotram

अथ श्री शिवमहिम्नस्तॊत्रम् ॥

महिम्नः पारं तॆ परमविदुषॊ यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथा‌உवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्यॆष स्तॊत्रॆ हर निरपवादः परिकरः ॥ 1 ॥

अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयॊः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्तॆ श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तॊतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदॆ त्वर्वाचीनॆ पतति न मनः कस्य न वचः ॥ 2 ॥

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन्‌ किं वागपि सुरगुरॊर्विस्मयपदम् ।
मम त्वॆतां वाणीं गुणकथनपुण्यॆन भवतः
पुनामीत्यर्थॆ‌உस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ॥ 3 ॥

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रॊशीं विदधत इहैकॆ जडधियः ॥ 4 ॥

किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारॊ धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतर्क्यैश्वर्यॆ त्वय्यनवसर दुःस्थॊ हतधियः
कुतर्कॊ‌உयं कांश्चित् मुखरयति मॊहाय जगतः ॥ 5 ॥

अजन्मानॊ लॊकाः किमवयववन्तॊ‌உपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशॊ वा कुर्याद् भुवनजननॆ कः परिकरॊ
यतॊ मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशॆरत इमॆ ॥ 6 ॥

त्रयी साङ्ख्यं यॊगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्नॆ प्रस्थानॆ परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामॆकॊ गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 7 ॥

महॊक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चॆतीयत्तव वरद तन्त्रॊपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥ 8 ॥

ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परॊ ध्रौव्या‌உध्रौव्यॆ जगति गदति व्यस्तविषयॆ ।
समस्तॆ‌உप्यॆतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन्‌ जिह्रॆमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥ 9 ॥

तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छॆतुं यातावनलमनलस्कन्धवपुषः ।
ततॊ भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थॆ ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ 10 ॥

अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यॊ यद्बाहूनभृत रणकण्डू-परवशान् ।
शिरःपद्मश्रॆणी-रचितचरणाम्भॊरुह-बलॆः
स्थिरायास्त्वद्भक्तॆस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ 11 ॥

अमुष्य त्वत्सॆवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासॆ‌உपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्या पातालॆ‌உप्यलसचलिताङ्गुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितॊ मुह्यति खलः ॥ 12 ॥

यदृद्धिं सुत्राम्णॊ वरद परमॊच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रॆ बाणः परिजनविधॆयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयॊः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ 13 ॥

अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-दॆवासुरकृपा
विधॆयस्या‌உ‌உसीद्‌ यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः ।
स कल्माषः कण्ठॆ तव न कुरुतॆ न श्रियमहॊ
विकारॊ‌உपि श्लाघ्यॊ भुवन-भय- भङ्ग- व्यसनिनः ॥ 14 ॥

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदॆवासुरनरॆ
निवर्तन्तॆ नित्यं जगति जयिनॊ यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥ 15 ॥

मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णॊर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह- गणम् ।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ 16 ॥

वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फॆनॊद्गम-रुचिः
प्रवाहॊ वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि तॆ ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तॆन कृतमिति
अनॆनैवॊन्नॆयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥ 17 ॥

रथः क्षॊणी यन्ता शतधृतिरगॆन्द्रॊ धनुरथॊ
रथाङ्गॆ चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति ।
दिधक्षॊस्तॆ कॊ‌உयं त्रिपुरतृणमाडम्बर-विधिः
विधॆयैः क्रीडन्त्यॊ न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥ 18 ॥

हरिस्तॆ साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयॊः
यदॆकॊनॆ तस्मिन्‌ निजमुदहरन्नॆत्रकमलम् ।
गतॊ भक्त्युद्रॆकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ 19 ॥

क्रतौ सुप्तॆ जाग्रत्‌ त्वमसि फलयॊगॆ क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृतॆ ।
अतस्त्वां सम्प्रॆक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ 20 ॥

क्रियादक्षॊ दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः ।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धा-विधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ 21 ॥

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रॊहिद्‌ भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणॆर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तॆ‌உद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥ 22 ॥

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं दॆवी यमनिरत-दॆहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥ 23 ॥

श्मशानॆष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालॆपः स्रगपि नृकरॊटी-परिकरः ।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि ॥ 24 ॥

मनः प्रत्यक्चित्तॆ सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रॊमाणः प्रमद-सलिलॊत्सङ्गति-दृशः ।
यदालॊक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमयॆ
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ॥ 25 ॥

त्वमर्कस्त्वं सॊमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्यॊम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामॆवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि ॥ 26 ॥

त्रयीं तिस्रॊ वृत्तीस्त्रिभुवनमथॊ त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति ।
तुरीयं तॆ धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्यॊमिति पदम् ॥ 27 ॥

भवः शर्वॊ रुद्रः पशुपतिरथॊग्रः सहमहान्
तथा भीमॆशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन् प्रत्यॆकं प्रविचरति दॆव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्नॆ प्रणिहित-नमस्यॊ‌உस्मि भवतॆ ॥ 28 ॥

नमॊ नॆदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षॊदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमॊ वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै तॆ तदिदमतिसर्वाय च नमः ॥ 29 ॥

बहुल-रजसॆ विश्वॊत्पत्तौ भवाय नमॊ नमः
प्रबल-तमसॆ तत् संहारॆ हराय नमॊ नमः ।
जन-सुखकृतॆ सत्त्वॊद्रिक्तौ मृडाय नमॊ नमः
प्रमहसि पदॆ निस्त्रैगुण्यॆ शिवाय नमॊ नमः ॥ 30 ॥

कृश-परिणति-चॆतः क्लॆशवश्यं क्व चॆदं क्व च तव गुण-सीमॊल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः ।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद् वरद चरणयॊस्तॆ वाक्य-पुष्पॊपहारम् ॥ 31 ॥

असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रॆ सुर-तरुवर-शाखा लॆखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ 32 ॥

असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्यॆन्दु-मौलॆः ग्रथित-गुणमहिम्नॊ निर्गुणस्यॆश्वरस्य ।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः रुचिरमलघुवृत्तैः स्तॊत्रमॆतच्चकार ॥ 33 ॥

अहरहरनवद्यं धूर्जटॆः स्तॊत्रमॆतत् पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः ।
स भवति शिवलॊकॆ रुद्रतुल्यस्तथा‌உत्र प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ॥ 34 ॥

महॆशान्नापरॊ दॆवॊ महिम्नॊ नापरा स्तुतिः ।
अघॊरान्नापरॊ मन्त्रॊ नास्ति तत्त्वं गुरॊः परम् ॥ 35 ॥

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षॊडशीम् ॥ 36 ॥

कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः
शशिधरवर-मौलॆर्दॆवदॆवस्य दासः ।
स खलु निज-महिम्नॊ भ्रष्ट ऎवास्य रॊषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः ॥ 37 ॥

सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मॊक्षैक-हॆतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-चॆताः ।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममॊघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ 38 ॥

आसमाप्तमिदं स्तॊत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम् ।
अनौपम्यं मनॊहारि सर्वमीश्वरवर्णनम् ॥ 39 ॥

इत्यॆषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयॊः ।
अर्पिता तॆन दॆवॆशः प्रीयतां मॆ सदाशिवः ॥ 40 ॥

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशॊ‌உसि महॆश्वर ।
यादृशॊ‌உसि महादॆव तादृशाय नमॊ नमः ॥ 41 ॥

ऎककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठॆन्नरः ।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लॊकॆ महीयतॆ ॥ 42 ॥

श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतॆन
स्तॊत्रॆण किल्बिष-हरॆण हर-प्रियॆण ।
कण्ठस्थितॆन पठितॆन समाहितॆन
सुप्रीणितॊ भवति भूतपतिर्महॆशः ॥ 43 ॥

॥ इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नः स्तॊत्रं समाप्तम् ॥

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