Archive for August, 2011

जय श्री गणेश

Tuesday, August 30th, 2011

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श्री गणेश चतुर्थी पूजा विधि – व्रत कथा

Monday, August 29th, 2011

श्री विनायक चतुर्थी पूजा - कथा- Sri Ganesh Chaturthi Puja Process and Katha

 

भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन सिद्धि विनायक व्रत किया जाता है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 2011, में यह व्रत 1 सितम्बर, गुरुवार के दिन किया जायेगा. इस व्रत के फल इस व्रत के अनुसार प्राप्त होते है. भगवान श्री गणेश को जीवन की विध्न-बाधाएं हटाने वाला कहा गया है. और श्री गणेश सभी कि मनोकामनाएं पूरी करते है. गणेशजी को सभी देवों में सबसे अधिक महत्व दिया गया है. कोई भी नया कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व भगवान श्री गणेश को याद किया जाता है. 

विनायक चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश का जन्म उत्सव का दिन है.  यह दिन गणेशोत्सव के रुप में सारे विश्व में बडे हि हर्ष व श्रद्वा के साथ मनाया जाता है. भारत में इसकी धूम यूं तो सभी प्रदेशों में होती है. परन्तु विशेष रुप से यह महाराष्ट में किया जाता है. इस उत्सव को महाराष्ट का मुख्य पर्व भी कहा जा सकता है. लोग मौहल्लों, चौराहों पर गणेशजी की स्थापना करते है. आरती और भगवान श्री गणेश के जयकारों से सारा माहौळ गुंज रहा होता है. इस उत्सव का अंत अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गणेश की मूर्ति समुद्र में विसर्जित करने के बाद होता है.  

श्री गणेश पूजा विधि

1. दीप प्रज्ज्वलन एवं पूजन

2. आचमन

3.पवित्रकरण (मार्जन)

4. आसन पूजा

5. स्वस्तिवाचन

6. संकल्प

Sankalp संकल्प : (दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले

‘ऊँ विष्णु र्विष्णुर्विष्णु : श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे —— नगरे —— ग्रामे वा बौद्धावतारे विजय नाम संवत्सरे श्री सूर्ये दक्षिणायने वर्षा ऋतौ महामाँगल्यप्रद मासोत्तमे शुभ भाद्रप्रद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थ्याम्‌ तिथौ भृगुवासरे हस्त नक्षत्रे शुभ योगे गर करणे तुला राशि स्थिते चन्द्रे सिंह राशि स्थिते सूर्य वृष राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायाँ चतुर्थ्याम्‌ शुभ पुण्य तिथौ —- गौत्रः —- अमुक शर्मा दासो ऽहं मम आत्मनः श्रीमन्‌ महागणपति प्रीत्यर्थम्‌ यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये।”

इसके पश्चात्‌ हाथ का जल किसी पात्र में छोड़ देवें।

7. श्री गणेश ध्यान 

8. आवाहन व प्रतिष्ठापन

Ganpati Aawahanam आवाहन

नागास्यम्‌ नागहारम्‌ त्वाम्‌ गणराजम्‌ चतुर्भुजम्‌। भूषितम्‌ स्व-आयुधै-है पाश-अंकुश परश्वधैहै॥

आवाह-यामि पूजार्थम्‌ रक्षार्थम्‌ च मम क्रतोहो। इह आगत्व गृहाण त्वम्‌ पूजा यागम्‌ च रक्ष मे॥

ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धिसहिताय गण-पतये नमह, गणपतिम्‌-आवाह-यामि स्थाप-यामि। (गंधाक्षत अर्पित करें।)

Pratisthhapan प्रतिष्ठापन

आवाहन के पश्चात देवता का प्रतिष्ठापन करें-

अस्यै प्राणाहा प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाह क्षरन्तु च। अस्यै देव-त्वम्‌-अर्चायै माम-हेति च कश्चन॥ ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहित-गणपते सु-प्रतिष्ठितो वरदो भव।

9. स्नान

10. वस्त्र एवं उपवस्त्र

11. गंध व सिन्दूर

12. पुष्प एवं पुष्पमाला

13. दूर्वा

14. धूप

15. दीप

16. नैवेद्य

17. दक्षिणा एवं श्रीफल

18. पुष्पों के सात श्री गणेश पूजा किजि ये – Offer Flowers to lord ganesha

विनायक अश्तोत्ताराम्स 108 names of ganesha

श्री गणेश स्तुती , गणेशा अश्तोत्तारा सथानमा स्तोत्रं , श्री गणेशा पंचारातना स्तोत्रं

18. आरती

19. पुष्पाँजलि

Pushpanjali Mantra पुष्पाञ्जलि समर्पण

ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, मन्त्र-पुष्प-अंजलि समर्पयामि।

20. प्रदक्षिणा

21. प्रार्थना एवं क्षमा प्रार्थना

Pradikshna and Kshama Prarthana प्रदक्षिणा व क्षमाप्रार्थना

 

यानि कानि च पापानि ज्ञात-अज्ञात-कृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिण-पदे पदे॥

आवाहनम्‌ न जानामि न जानामि तवार्चनाम्‌ । यत्‌-पूजितम्‌ मया देव परि-पूर्णम्‌ तदस्तु मे ॥

अपराध सहस्त्राणि-क्रियंते अहर्नीशं मया । तत्‌सर्वम्‌ क्षम्यताम्‌ देव प्रसीद परमेश्वर ॥

22. प्रणाम एवं पूजा समर्पण।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा – Ganesh Chaturthi Vrat Story

श्री गणेश चतुर्थी व्रत को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलन में है. कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थें. वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिये चौपड खेलने को कहा. भगवान शंकर चौपड खेलने के लिये तो तैयार हो गये. परन्तु इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा?

इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी. और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते है. परन्तु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिये तुम बताना की हम मे से कौन हारा और कौन जीता.

यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया. खेल तीन बार खेला गया, और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई. खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिये कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई. और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने व किचड में पडे रहने का श्राप दे दिया. बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऎसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऎसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिये नाग कन्याएं आयेंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऎसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगें, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई.

ठिक एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं. नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालुम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया. उसकी श्रद्वा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए. और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिये कहा. बालक ने कहा की है विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों.

बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अन्तर्धान हो गए. बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गई. देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताये अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया. इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी. वह समाप्त होई.

यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई. यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई. माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया. व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें. उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है.   

विनायक चतुर्थी व्रत विधि (Vinayak Chaturthi Fast Method)

श्री गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन हुआ था. इसलिये इनके जन्म दिवस को व्रत कर श्री गणेश जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है. जिस वर्ष में यह व्रत रविवार और मंगलवार के दिन का होता है. उस वर्ष में इस व्रत को महाचतुर्थी व्रत कहा जाता है.   

इस व्रत को करने की विधि भी श्री गणेश के अन्य व्रतों के समान ही सरल है. गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास में कृ्ष्णपक्ष की चतुर्थी में किया जाता है,. पर इस व्रत की यह विशेषता है, कि यह व्रत सिद्धि विनायक श्री गणेश के जन्म दिवस के दिन किया जाता है. सभी 12 चतुर्थियों में माघ, श्रावण, भाद्रपद और मार्गशीर्ष माह में पडने वाली चतुर्थी का व्रत करन विशेष कल्याणकारी रहता है. 

व्रत के दिन उपवासक को प्रात:काल में जल्द उठना चाहिए. सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नान और अन्य नित्यकर्म कर, सारे घर को गंगाजल से शुद्ध कर लेना चाहिए. स्नान करने के लिये भी अगर सफेद तिलों के घोल को जल में मिलाकर स्नान किया जाता है. तो शुभ रहता है. प्रात: श्री गणेश की पूजा करने के बाद, दोपहर में गणेश के बीजमंत्र ऊँ गं गणपतये नम: का जाप करना चाहिए.

इसके पश्चात भगवान श्री गणेश  धूप, दूर्वा, दीप, पुष्प, नैवेद्ध व जल आदि से पूजन करना चाहिए. और भगवान श्री गणेश को लाल वस्त्र धारण कराने चाहिए. अगर यह संभव न हों, तो लाल वस्त्र का दान करना चाहिए.

पूजा में घी से बने 21 लड्डूओं से पूजा करनी चाहिए. इसमें से दस अपने पास रख कर, शेष सामग्री और गणेश मूर्ति किसी ब्राह्मण को दान-दक्षिणा सहित दान कर देनी चाहिए. 

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श्री गणेश संकट चौथ व्रत

Monday, August 29th, 2011

श्री गणेश संकट चौथ व्रत – Shri Ganesh Sankat Chouth Vrat

गणेश चतुर्थी का व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है | इस दिन विधा – बुद्धि – वारिधि के सवामी गणेश तथा चंद्रमा की पूजा की जाती है |

Sankasti Chaturthi is celebrated on 4th day of krishna paksha every month. People observe fast the whole day to get rid of their problems in life.

माता पार्वती ने भी भगवान शंकर के कहने पर माघ कृष्ण चतुर्थी को संकष्ट हरण श्री गणेश जी का व्रत रखा था | फलस्वरूप उन्हें गणेश जी पुत्रस्वरूप में प्राप्त हुए| भगवान शंकर के मस्तक पर सुशोभित होने वाला चंद्रमा आज के दिन श्री गणेश भगवान के मस्तक पर विराजमान होता है| इसलिए आज चंद्रा दर्शन का अर्थ है श्री गणेश भगवान के दर्शन होना|

माघ कृ्ष्ण पक्ष (संकट चौथ) – Sat, 22 Jan 2011
माघ शुक्ल पक्ष (तिल चौथ) – Sun, 6 Feb 2011

On this day, one should observe a complete fast the whole day. In the evening after a bath, one should make preparations for the ritualistic worship of Lord Ganesh. In the night after looking at the moon, either an idol of Ganesh or a betelnut placed on a mound of consecrated rice (akshata) symbolic of Ganesh, should be worshipped with sixteen substances (shodashopchar puja). Twenty-one rounds (avartans) of the Atharvashirsha should be recited. One should pay obeisance to the moon after giving an offering and sprinkling sandalwood paste (gandha), flowers and consecrated rice in its direction.

माघ मास में ‘भालचन्द्र’ नामक गणेश की पूजा करनी चाहिए | इनका पूजन षोडशोउपचार विधि से करना चाहिए | तिल के दस लड्डू बनाकर, पांच लड्डू देवता को चढ़ावे और शेष पांच ब्रह्मण को दान दे देवें | मोदक तथा गुड मे बने तिल (सफेद) के लड्डू और मगदल का नैवेद्या अर्पित करें- चावल के लड्डू भी चढ़ाएं | चंद्र दर्शन करें और चंद्रमा को भी अर्घ्या प्रदान करें| क्योंकि इस दिन भगवान गणेश चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करतें हैं|  माघ कृष्ण – गणेश चतुर्थी व्रत कथा ( ऋषि शर्मा ब्राह्मण की कथा ) पढ़े या सुने |

Ganesh Sankashti Chaturthi Mantra Stuti

गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्दिप्रदायकम.
संकष्ठ हरणं मे देव गृहानार्घः नमोस्तुते -
कृष्ण पक्षे चतुर्थ याँ तू सम्पुजितिम विधुदये.
क्षिप्रं प्रसीद देवेश गृहानार्घः नमोस्तुते -

Chaturthi Tithi Mantra

तिथिनामुत्तमे देवी गणेश प्रियेवाल्लभे-
सर्वसंकट नाशाय गृहण अर्घ्य नमोस्तुते .
“चतुर्थ येई नमः ” इदम् अर्घ समर्पयामि

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श्री गणेश स्तुती

Monday, August 29th, 2011

  

श्री गणेश स्तुती  – श्री गणेश मन्त्र  – Sri Ganesha Mantra Stuti

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजंबूफलचारुभक्षणम्‌ ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्‌ ॥
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र ।
वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥

Sri Ganesha Mantra with Meaning

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

“Oh! Lord (Ganesha), of huge body and curved elephant trunk, whose brilliance is equal to billions of suns, always remove all obstacles from my endeavors.”

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजंबूफलचारुभक्षणम्‌ ।

उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्‌ ॥

“Salutations to Lord Ganesha who has an elephant head, who is attended by the band of his followers, who eats his favorite wood-apple and rose-apple fruits, who is the son of Goddess Uma, who is the cause of destruction of all sorrow. And I salute to his feet which are like lotus.”

सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः ।

लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

Sumukha, Ekadanta, Kapila, Gajakarnaka, Lambodara, Vikata, Vighnanaasha, Ganaadhipa, Dhuumraketu, Ganaadhyaksha, Bhaalachandra, Gajaanana –

No obstacles will come in the way of one who reads or listens to these 12 names of Lord Ganesha at the beginning of education, at the time of marriage, while entering or exiting anything, during a battle or calamity.

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

“In order to remove all obstacles, one should meditate on (the Lord Ganesha) as wearing a white garment, as having the complexion like the moon, and having four arms and a pleasant countenance.”

मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र ।

वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥

“Oh God who has the mouse as his vehicle, and the sweet modhaka (rice ball) in your hand, whose ears are wide like fans, wearing the sacred thread. Oh son of Lord Shiva who is of short stature and who removes all obstacles, Lord Vinayaka, I bow at your feet.”

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श्री शिवानान्दा लहरी

Saturday, August 27th, 2011

श्री शिवानान्दा लहरी  – Sri Shivananda Lahari

कलाभ्यां चूडालङ्कृत-शशि कलाभ्यां निज तपः-
फलाभ्यां भक्तॆशु प्रकटित-फलाभ्यां भवतु मॆ ।
शिवाभ्यां-अस्तॊक-त्रिभुवन शिवाभ्यां हृदि पुनर्-
भवाभ्याम् आनन्द स्फुर-दनुभवाभ्यां नतिरियम् ॥ 1 ॥

गलन्ती शम्भॊ त्वच्-चरित-सरितः किल्बिश-रजॊ
दलन्ती धीकुल्या-सरणिशु पतन्ती विजयताम्
दिशन्ती संसार-भ्रमण-परिताप-उपशमनं
वसन्ती मच्-चॆतॊ-हृदभुवि शिवानन्द-लहरी 2

त्रयी-वॆद्यं हृद्यं त्रि-पुर-हरम् आद्यं त्रि-नयनं
जटा-भारॊदारं चलद्-उरग-हारं मृग धरम्
महा-दॆवं दॆवं मयि सदय-भावं पशु-पतिं
चिद्-आलम्बं साम्बं शिवम्-अति-विडम्बं हृदि भजॆ 3

सहस्रं वर्तन्तॆ जगति विबुधाः क्शुद्र-फलदा
न मन्यॆ स्वप्नॆ वा तद्-अनुसरणं तत्-कृत-फलम्
हरि-ब्रह्मादीनां-अपि निकट-भाजां-असुलभं
चिरं याचॆ शम्भॊ शिव तव पदाम्भॊज-भजनम् 4

स्मृतौ शास्त्रॆ वैद्यॆ शकुन-कविता-गान-फणितौ
पुराणॆ मन्त्रॆ वा स्तुति-नटन-हास्यॆशु-अचतुरः
कथं राज्नां प्रीतिर्-भवति मयि कॊ(अ)हं पशु-पतॆ
पशुं मां सर्वज्न प्रथित-कृपया पालय विभॊ 5

घटॊ वा मृत्-पिण्डॊ-अपि-अणुर्-अपि च धूमॊ-अग्निर्-अचलः
पटॊ वा तन्तुर्-वा परिहरति किं घॊर-शमनम्
वृथा कण्ठ-क्शॊभं वहसि तरसा तर्क-वचसा
पदाम्भॊजं शम्भॊर्-भज परम-सौख्यं व्रज सुधीः 6

मनस्-तॆ पादाब्जॆ निवसतु वचः स्तॊत्र-फणितौ
करौ च-अभ्यर्चायां श्रुतिर्-अपि कथाकर्णन-विधौ
तव ध्यानॆ बुद्धिर्-नयन-युगलं मूर्ति-विभवॆ
पर-ग्रन्थान् कैर्-वा परम-शिव जानॆ परम्-अतः 7

यथा बुद्धिः-शुक्तौ रजतम् इति काचाश्मनि मणिर्-
जलॆ पैश्टॆ क्शीरं भवति मृग-तृश्णासु सलिलम्
तथा दॆव-भ्रान्त्या भजति भवद्-अन्यं जड जनॊ
महा-दॆवॆशं त्वां मनसि च न मत्वा पशु-पतॆ 8

गभीरॆ कासारॆ विशति विजनॆ घॊर-विपिनॆ
विशालॆ शैलॆ च भ्रमति कुसुमार्थं जड-मतिः
समर्प्यैकं चॆतः-सरसिजम् उमा नाथ भवतॆ
सुखॆन-अवस्थातुं जन इह न जानाति किम्-अहॊ 9

नरत्वं दॆवत्वं नग-वन-मृगत्वं मशकता
पशुत्वं कीटत्वं भवतु विहगत्वादि-जननम्
सदा त्वत्-पादाब्ज-स्मरण-परमानन्द-लहरी
विहारासक्तं चॆद्-हृदयं-इह किं तॆन वपुशा 10

वटुर्वा गॆही वा यतिर्-अपि जटी वा तदितरॊ
नरॊ वा यः कश्चिद्-भवतु भव किं तॆन भवति
यदीयं हृत्-पद्मं यदि भवद्-अधीनं पशु-पतॆ
तदीयस्-त्वं शम्भॊ भवसि भव भारं च वहसि 11

गुहायां गॆहॆ वा बहिर्-अपि वनॆ वा(अ)द्रि-शिखरॆ
जलॆ वा वह्नौ वा वसतु वसतॆः किं वद फलम्
सदा यस्यैवान्तःकरणम्-अपि शम्बॊ तव पदॆ
स्थितं चेद्-यॊगॊ(अ)सौ स च परम-यॊगी स च सुखी 12

असारॆ संसारॆ निज-भजन-दूरॆ जडधिया
भरमन्तं माम्-अन्धं परम-कृपया पातुम् उचितम्
मद्-अन्यः कॊ दीनस्-तव कृपण-रक्शाति-निपुणस्-
त्वद्-अन्यः कॊ वा मॆ त्रि-जगति शरण्यः पशु-पतॆ 13

प्रभुस्-त्वं दीनानां खलु परम-बन्धुः पशु-पतॆ
प्रमुख्यॊ(अ)हं तॆशाम्-अपि किम्-उत बन्धुत्वम्-अनयॊः
त्वयैव क्शन्तव्याः शिव मद्-अपराधाश्-च सकलाः
प्रयत्नात्-कर्तव्यं मद्-अवनम्-इयं बन्धु-सरणिः 14

उपॆक्शा नॊ चॆत् किं न हरसि भवद्-ध्यान-विमुखां
दुराशा-भूयिश्ठां विधि-लिपिम्-अशक्तॊ यदि भवान्
शिरस्-तद्-वदिधात्रं न नखलु सुवृत्तं पशु-पतॆ
कथं वा निर्-यत्नं कर-नख-मुखॆनैव लुलितम् 15

विरिन्चिर्-दीर्घायुर्-भवतु भवता तत्-पर-शिरश्-
चतुश्कं संरक्श्यं स खलु भुवि दैन्यं लिखितवान्
विचारः कॊ वा मां विशद-कृपया पाति शिव तॆ
कटाक्श-व्यापारः स्वयम्-अपि च दीनावन-परः 16

फलाद्-वा पुण्यानां मयि करुणया वा त्वयि विभॊ
प्रसन्नॆ(अ)पि स्वामिन् भवद्-अमल-पादाब्ज-युगलम्
कथं पश्यॆयं मां स्थगयति नमः-सम्भ्रम-जुशां
निलिम्पानां श्रॆणिर्-निज-कनक-माणिक्य-मकुटैः 17

त्वम्-ऎकॊ लॊकानां परम-फलदॊ दिव्य-पदवीं
वहन्तस्-त्वन्मूलां पुनर्-अपि भजन्तॆ हरि-मुखाः
कियद्-वा दाक्शिण्यं तव शिव मदाशा च कियती
कदा वा मद्-रक्शां वहसि करुणा-पूरित-दृशा 18

दुराशा-भूयिश्ठॆ दुरधिप-गृह-द्वार-घटकॆ
दुरन्तॆ संसारॆ दुरित-निलयॆ दुःख जनकॆ
मदायासम् किं न व्यपनयसि कस्यॊपकृतयॆ
वदॆयं प्रीतिश्-चॆत् तव शिव कृतार्थाः खलु वयम् 19

सदा मॊहाटव्यां चरति युवतीनां कुच-गिरौ
नटत्य्-आशा-शाखास्-वटति झटिति स्वैरम्-अभितः
कपालिन् भिक्शॊ मॆ हृदय-कपिम्-अत्यन्त-चपलं
दृढं भक्त्या बद्ध्वा शिव भवद्-अधीनं कुरु विभॊ 20

धृति-स्तम्भाधारं दृढ-गुण निबद्धां सगमनां
विचित्रां पद्माढ्यां प्रति-दिवस-सन्मार्ग-घटिताम्
स्मरारॆ मच्चॆतः-स्फुट-पट-कुटीं प्राप्य विशदां
जय स्वामिन् शक्त्या सह शिव गणैः-सॆवित विभॊ 21

प्रलॊभाद्यैर्-अर्थाहरण-पर-तन्त्रॊ धनि-गृहॆ
प्रवॆशॊद्युक्तः-सन् भ्रमति बहुधा तस्कर-पतॆ
इमं चॆतश्-चॊरं कथम्-इह सहॆ शन्कर विभॊ
तवाधीनं कृत्वा मयि निरपराधॆ कुरु कृपाम् 22

करॊमि त्वत्-पूजां सपदि सुखदॊ मॆ भव विभॊ
विधित्वं विश्णुत्वम् दिशसि खलु तस्याः फलम्-इति
पुनश्च त्वां द्रश्टुं दिवि भुवि वहन् पक्शि-मृगताम्-
अदृश्ट्वा तत्-खॆदं कथम्-इह सहॆ शन्कर विभॊ 23

कदा वा कैलासॆ कनक-मणि-सौधॆ सह-गणैर्-
वसन् शम्भॊर्-अग्रॆ स्फुट-घटित-मूर्धान्जलि-पुटः
विभॊ साम्ब स्वामिन् परम-शिव पाहीति निगदन्
विधातृऋणां कल्पान् क्शणम्-इव विनॆश्यामि सुखतः 24

स्तवैर्-ब्रह्मादीनां जय-जय-वचॊभिर्-नियमानां
गणानां कॆलीभिर्-मदकल-महॊक्शस्य ककुदि
स्थितं नील-ग्रीवं त्रि-नयनं-उमाश्लिश्ट-वपुशं
कदा त्वां पश्यॆयं कर-धृत-मृगं खण्ड-परशुम् 25

कदा वा त्वां दृश्ट्वा गिरिश तव भव्यान्घ्रि-युगलं
गृहीत्वा हस्ताभ्यां शिरसि नयनॆ वक्शसि वहन्
समाश्लिश्याघ्राय स्फुट-जलज-गन्धान् परिमलान्-
अलभ्यां ब्रह्माद्यैर्-मुदम्-अनुभविश्यामि हृदयॆ 26

करस्थॆ हॆमाद्रौ गिरिश निकटस्थॆ धन-पतौ
गृहस्थॆ स्वर्भूजा(अ)मर-सुरभि-चिन्तामणि-गणॆ
शिरस्थॆ शीतांशौ चरण-युगलस्थॆ(अ)खिल शुभॆ
कम्-अर्थं दास्यॆ(अ)हं भवतु भवद्-अर्थं मम मनः 27

सारूप्यं तव पूजनॆ शिव महा-दॆवॆति सङ्कीर्तनॆ
सामीप्यं शिव भक्ति-धुर्य-जनता-साङ्गत्य-सम्भाशणॆ
सालॊक्यं च चराचरात्मक-तनु-ध्यानॆ भवानी-पतॆ
सायुज्यं मम सिद्धिम्-अत्र भवति स्वामिन् कृतार्थॊस्म्यहम् 28

त्वत्-पादाम्बुजम्-अर्चयामि परमं त्वां चिन्तयामि-अन्वहं
त्वाम्-ईशं शरणं व्रजामि वचसा त्वाम्-ऎव याचॆ विभॊ
वीक्शां मॆ दिश चाक्शुशीं स-करुणां दिव्यैश्-चिरं प्रार्थितां
शम्भॊ लॊक-गुरॊ मदीय-मनसः सौख्यॊपदॆशं कुरु 29

वस्त्रॊद्-धूत विधौ सहस्र-करता पुश्पार्चनॆ विश्णुता
गन्धॆ गन्ध-वहात्मता(अ)न्न-पचनॆ बहिर्-मुखाध्यक्शता
पात्रॆ कान्चन-गर्भतास्ति मयि चॆद् बालॆन्दु चूडा-मणॆ
शुश्रूशां करवाणि तॆ पशु-पतॆ स्वामिन् त्रि-लॊकी-गुरॊ 30

नालं वा परमॊपकारकम्-इदं त्वॆकं पशूनां पतॆ
पश्यन् कुक्शि-गतान् चराचर-गणान् बाह्यस्थितान् रक्शितुम्
सर्वामर्त्य-पलायनौशधम्-अति-ज्वाला-करं भी-करं
निक्शिप्तं गरलं गलॆ न गलितं नॊद्गीर्णम्-ऎव-त्वया 31

ज्वालॊग्रः सकलामराति-भयदः क्श्वॆलः कथं वा त्वया
दृश्टः किं च करॆ धृतः कर-तलॆ किं पक्व-जम्बू-फलम्
जिह्वायां निहितश्च सिद्ध-घुटिका वा कण्ठ-दॆशॆ भृतः
किं तॆ नील-मणिर्-विभूशणम्-अयं शम्भॊ महात्मन् वद 32

नालं वा सकृद्-ऎव दॆव भवतः सॆवा नतिर्-वा नुतिः
पूजा वा स्मरणं कथा-श्रवणम्-अपि-आलॊकनं मादृशाम्
स्वामिन्न्-अस्थिर-दॆवतानुसरणायासॆन किं लभ्यतॆ
का वा मुक्तिर्-इतः कुतॊ भवति चॆत् किं प्रार्थनीयं तदा 33

किं ब्रूमस्-तव साहसं पशु-पतॆ कस्यास्ति शम्भॊ भवद्-
धैर्यं चॆदृशम्-आत्मनः-स्थितिर्-इयं चान्यैः कथं लभ्यतॆ
भ्रश्यद्-दॆव-गणं त्रसन्-मुनि-गणं नश्यत्-प्रपन्चं लयं
पश्यन्-निर्भय ऎक ऎव विहरति-आनन्द-सान्द्रॊ भवान् 34

यॊग-क्शॆम-धुरं-धरस्य सकलः-श्रॆयः प्रदॊद्यॊगिनॊ
दृश्टादृश्ट-मतॊपदॆश-कृतिनॊ बाह्यान्तर-व्यापिनः
सर्वज्नस्य दया-करस्य भवतः किं वॆदितव्यं मया
शम्भॊ त्वं परमान्तरङ्ग इति मॆ चित्तॆ स्मरामि-अन्वहम् 35

भक्तॊ भक्ति-गुणावृतॆ मुद्-अमृता-पूर्णॆ प्रसन्नॆ मनः
कुम्भॆ साम्ब तवान्घ्रि-पल्लव युगं संस्थाप्य संवित्-फलम्
सत्त्वं मन्त्रम्-उदीरयन्-निज शरीरागार शुद्धिं वहन्
पुण्याहं प्रकटी करॊमि रुचिरं कल्याणम्-आपादयन् 36

आम्नायाम्बुधिम्-आदरॆण सुमनः-सन्घाः-समुद्यन्-मनॊ
मन्थानं दृढ भक्ति-रज्जु-सहितं कृत्वा मथित्वा ततः
सॊमं कल्प-तरुं सु-पर्व-सुरभिं चिन्ता-मणिं धीमतां
नित्यानन्द-सुधां निरन्तर-रमा-सौभाग्यम्-आतन्वतॆ 37

प्राक्-पुण्याचल-मार्ग-दर्शित-सुधा-मूर्तिः प्रसन्नः-शिवः
सॊमः-सद्-गुण-सॆवितॊ मृग-धरः पूर्णास्-तमॊ-मॊचकः
चॆतः पुश्कर-लक्शितॊ भवति चॆद्-आनन्द-पाथॊ-निधिः
प्रागल्भ्यॆन विजृम्भतॆ सुमनसां वृत्तिस्-तदा जायतॆ 38

धर्मॊ मॆ चतुर्-अन्घ्रिकः सुचरितः पापं विनाशं गतं
काम-क्रॊध-मदादयॊ विगलिताः कालाः सुखाविश्कृताः
ज्नानानन्द-महौशधिः सुफलिता कैवल्य नाथॆ सदा
मान्यॆ मानस-पुण्डरीक-नगरॆ राजावतंसॆ स्थितॆ 39

धी-यन्त्रॆण वचॊ-घटॆन कविता-कुल्यॊपकुल्याक्रमैर्-
आनीतैश्च सदाशिवस्य चरिताम्भॊ-राशि-दिव्यामृतैः
हृत्-कॆदार-युताश्-च भक्ति-कलमाः साफल्यम्-आतन्वतॆ
दुर्भिक्शान्-मम सॆवकस्य भगवन् विश्वॆश भीतिः कुतः 40

पापॊत्पात-विमॊचनाय रुचिरैश्वर्याय मृत्युं-जय
स्तॊत्र-ध्यान-नति-प्रदिक्शिण-सपर्यालॊकनाकर्णनॆ
जिह्वा-चित्त-शिरॊन्घ्रि-हस्त-नयन-श्रॊत्रैर्-अहम् प्रार्थितॊ
माम्-आज्नापय तन्-निरूपय मुहुर्-मामॆव मा मॆ(अ)वचः 41

गाम्भीर्यं परिखा-पदं घन-धृतिः प्राकार-उद्यद्-गुण
स्तॊमश्-चाप्त-बलं घनॆन्द्रिय-चयॊ द्वाराणि दॆहॆ स्थितः
विद्या-वस्तु-समृद्धिर्-इति-अखिल-सामग्री-समॆतॆ सदा
दुर्गाति-प्रिय-दॆव मामक-मनॊ-दुर्गॆ निवासं कुरु 42

मा गच्च त्वम्-इतस्-ततॊ गिरिश भॊ मय्यॆव वासं कुरु
स्वामिन्न्-आदि किरात मामक-मनः कान्तार-सीमान्तरॆ
वर्तन्तॆ बहुशॊ मृगा मद-जुशॊ मात्सर्य-मॊहादयस्-
तान् हत्वा मृगया-विनॊद रुचिता-लाभं च सम्प्राप्स्यसि 43

कर-लग्न मृगः करीन्द्र-भन्गॊ
घन शार्दूल-विखण्डनॊ(अ)स्त-जन्तुः
गिरिशॊ विशद्-आकृतिश्-च चॆतः
कुहरॆ पन्च मुखॊस्ति मॆ कुतॊ भीः 44

चन्दः-शाखि-शिखान्वितैर्-द्विज-वरैः संसॆवितॆ शाश्वतॆ
सौख्यापादिनि खॆद-भॆदिनि सुधा-सारैः फलैर्-दीपितॆ
चॆतः पक्शि-शिखा-मणॆ त्यज वृथा-सन्चारम्-अन्यैर्-अलं
नित्यं शन्कर-पाद-पद्म-युगली-नीडॆ विहारं कुरु 45

आकीर्णॆ नख-राजि-कान्ति-विभवैर्-उद्यत्-सुधा-वैभवैर्-
आधौतॆपि च पद्म-राग-ललितॆ हंस-व्रजैर्-आश्रितॆ
नित्यं भक्ति-वधू गणैश्-च रहसि स्वॆच्चा-विहारं कुरु
स्थित्वा मानस-राज-हंस गिरिजा नाथान्घ्रि-सौधान्तरॆ 46

शम्भु-ध्यान-वसन्त-सन्गिनि हृदारामॆ(अ)घ-जीर्णच्चदाः
स्रस्ता भक्ति लताच्चटा विलसिताः पुण्य-प्रवाल-श्रिताः
दीप्यन्तॆ गुण-कॊरका जप-वचः पुश्पाणि सद्-वासना
ज्नानानन्द-सुधा-मरन्द-लहरी संवित्-फलाभ्युन्नतिः 47

नित्यानन्द-रसालयं सुर-मुनि-स्वान्ताम्बुजाताश्रयं
स्वच्चं सद्-द्विज-सॆवितं कलुश-हृत्-सद्-वासनाविश्कृतम्
शम्भु-ध्यान-सरॊवरं व्रज मनॊ-हंसावतंस स्थिरं
किं क्शुद्राश्रय-पल्वल-भ्रमण-सञ्जात-श्रमं प्राप्स्यसि 48

आनन्दामृत-पूरिता हर-पदाम्भॊजालवालॊद्यता
स्थैर्यॊपघ्नम्-उपॆत्य भक्ति लतिका शाखॊपशाखान्विता
उच्चैर्-मानस-कायमान-पटलीम्-आक्रम्य निश्-कल्मशा
नित्याभीश्ट-फल-प्रदा भवतु मॆ सत्-कर्म-संवर्धिता 49

सन्ध्यारम्भ-विजृम्भितं श्रुति-शिर-स्थानान्तर्-आधिश्ठितं
स-प्रॆम भ्रमराभिरामम्-असकृत् सद्-वासना-शॊभितम्
भॊगीन्द्राभरणं समस्त-सुमनः-पूज्यं गुणाविश्कृतं
सॆवॆ श्री-गिरि-मल्लिकार्जुन-महा-लिन्गं शिवालिन्गितम् 50

भृन्गीच्चा-नटनॊत्कटः करि-मद-ग्राही स्फुरन्-माधव-
आह्लादॊ नाद-युतॊ महासित-वपुः पन्चॆशुणा चादृतः
सत्-पक्शः सुमनॊ-वनॆशु स पुनः साक्शान्-मदीयॆ मनॊ
राजीवॆ भ्रमराधिपॊ विहरतां श्री शैल-वासी विभुः 51

कारुण्यामृत-वर्शिणं घन-विपद्-ग्रीश्मच्चिदा-कर्मठं
विद्या-सस्य-फलॊदयाय सुमनः-संसॆव्यम्-इच्चाकृतिम्
नृत्यद्-भक्त-मयूरम्-अद्रि-निलयं चन्चज्-जटा-मण्डलं
शम्भॊ वान्चति नील-कन्धर-सदा त्वां मॆ मनश्-चातकः 52

आकाशॆन शिखी समस्त फणिनां नॆत्रा कलापी नता-
(अ)नुग्राहि-प्रणवॊपदॆश-निनदैः कॆकीति यॊ गीयतॆ
श्यामां शैल-समुद्भवां घन-रुचिं दृश्ट्वा नटन्तं मुदा
वॆदान्तॊपवनॆ विहार-रसिकं तं नील-कण्ठं भजॆ 53

सन्ध्या घर्म-दिनात्ययॊ हरि-कराघात-प्रभूतानक-
ध्वानॊ वारिद गर्जितं दिविशदां दृश्टिच्चटा चन्चला
भक्तानां परितॊश बाश्प विततिर्-वृश्टिर्-मयूरी शिवा
यस्मिन्न्-उज्ज्वल-ताण्डवं विजयतॆ तं नील-कण्ठं भजॆ 54

आद्यायामित-तॆजसॆ-श्रुति-पदैर्-वॆद्याय साध्याय तॆ
विद्यानन्द-मयात्मनॆ त्रि-जगतः-संरक्शणॊद्यॊगिनॆ
ध्यॆयायाखिल-यॊगिभिः-सुर-गणैर्-गॆयाय मायाविनॆ
सम्यक् ताण्डव-सम्भ्रमाय जटिनॆ सॆयं नतिः-शम्भवॆ 55

नित्याय त्रि-गुणात्मनॆ पुर-जितॆ कात्यायनी-श्रॆयसॆ
सत्यायादि कुटुम्बिनॆ मुनि-मनः प्रत्यक्श-चिन्-मूर्तयॆ
माया-सृश्ट-जगत्-त्रयाय सकल-आम्नायान्त-सन्चारिणॆ
सायं ताण्डव-सम्भ्रमाय जटिनॆ सॆयं नतिः-शम्भवॆ 56

नित्यं स्वॊदर-पॊशणाय सकलान्-उद्दिश्य वित्ताशया
व्यर्थं पर्यटनं करॊमि भवतः-सॆवां न जानॆ विभॊ
मज्-जन्मान्तर-पुण्य-पाक-बलतस्-त्वं शर्व सर्वान्तरस्-
तिश्ठस्यॆव हि तॆन वा पशु-पतॆ तॆ रक्शणीयॊ(अ)स्म्यहम् 57

ऎकॊ वारिज-बान्धवः क्शिति-नभॊ व्याप्तं तमॊ-मण्डलं
भित्वा लॊचन-गॊचरॊपि भवति त्वं कॊटि-सूर्य-प्रभः
वॆद्यः किं न भवस्यहॊ घन-तरं कीदृन्ग्भवॆन्-मत्तमस्-
तत्-सर्वं व्यपनीय मॆ पशु-पतॆ साक्शात् प्रसन्नॊ भव 58

हंसः पद्म-वनं समिच्चति यथा नीलाम्बुदं चातकः
कॊकः कॊक-नद-प्रियं प्रति-दिनं चन्द्रं चकॊरस्-तथा
चॆतॊ वान्चति मामकं पशु-पतॆ चिन्-मार्ग मृग्यं विभॊ
गौरी नाथ भवत्-पदाब्ज-युगलं कैवल्य-सौख्य-प्रदम् 59

रॊधस्-तॊयहृतः श्रमॆण-पथिकश्-चायां तरॊर्-वृश्टितः
भीतः स्वस्थ गृहं गृहस्थम्-अतिथिर्-दीनः प्रभं धार्मिकम्
दीपं सन्तमसाकुलश्-च शिखिनं शीतावृतस्-त्वं तथा
चॆतः-सर्व-भयापहं-व्रज सुखं शम्भॊः पदाम्भॊरुहम् 60

अन्कॊलं निज बीज सन्ततिर्-अयस्कान्तॊपलं सूचिका
साध्वी नैज विभुं लता क्शिति-रुहं सिन्धुह्-सरिद्-वल्लभम्
प्राप्नॊतीह यथा तथा पशु-पतॆः पादारविन्द-द्वयं
चॆतॊवृत्तिर्-उपॆत्य तिश्ठति सदा सा भक्तिर्-इति-उच्यतॆ 61

आनन्दाश्रुभिर्-आतनॊति पुलकं नैर्मल्यतश्-चादनं
वाचा शन्ख मुखॆ स्थितैश्-च जठरा-पूर्तिं चरित्रामृतैः
रुद्राक्शैर्-भसितॆन दॆव वपुशॊ रक्शां भवद्-भावना-
पर्यन्कॆ विनिवॆश्य भक्ति जननी भक्तार्भकं रक्शति 62

मार्गा-वर्तित पादुका पशु-पतॆर्-अङ्गस्य कूर्चायतॆ
गण्डूशाम्बु-निशॆचनं पुर-रिपॊर्-दिव्याभिशॆकायतॆ
किन्चिद्-भक्शित-मांस-शॆश-कबलं नव्यॊपहारायतॆ
भक्तिः किं न करॊति-अहॊ वन-चरॊ भक्तावतम्सायतॆ 63

वक्शस्ताडनम्-अन्तकस्य कठिनापस्मार सम्मर्दनं
भू-भृत्-पर्यटनं नमत्-सुर-शिरः-कॊटीर सन्घर्शणम्
कर्मॆदं मृदुलस्य तावक-पद-द्वन्द्वस्य गौरी-पतॆ
मच्चॆतॊ-मणि-पादुका-विहरणं शम्भॊ सदान्गी-कुरु 64

वक्शस्-ताडन शन्कया विचलितॊ वैवस्वतॊ निर्जराः
कॊटीरॊज्ज्वल-रत्न-दीप-कलिका-नीराजनं कुर्वतॆ
दृश्ट्वा मुक्ति-वधूस्-तनॊति निभृताश्लॆशं भवानी-पतॆ
यच्-चॆतस्-तव पाद-पद्म-भजनं तस्यॆह किं दुर्-लभम् 65

क्रीडार्थं सृजसि प्रपन्चम्-अखिलं क्रीडा-मृगास्-तॆ जनाः
यत्-कर्माचरितं मया च भवतः प्रीत्यै भवत्यॆव तत्
शम्भॊ स्वस्य कुतूहलस्य करणं मच्चॆश्टितं निश्चितं
तस्मान्-मामक रक्शणं पशु-पतॆ कर्तव्यम्-ऎव त्वया 66

बहु-विध-परितॊश-बाश्प-पूर-
स्फुट-पुलकान्कित-चारु-भॊग-भूमिम्
चिर-पद-फल-कान्क्शि-सॆव्यमानां
परम सदाशिव-भावनां प्रपद्यॆ 67

अमित-मुदमृतं मुहुर्-दुहन्तीं
विमल-भवत्-पद-गॊश्ठम्-आवसन्तीम्
सदय पशु-पतॆ सुपुण्य-पाकां
मम परिपालय भक्ति धॆनुम्-ऎकाम् 68

जडता पशुता कलन्किता
कुटिल-चरत्वं च नास्ति मयि दॆव
अस्ति यदि राज-मौलॆ
भवद्-आभरणस्य नास्मि किं पात्रम् 69

अरहसि रहसि स्वतन्त्र-बुद्ध्या
वरि-वसितुं सुलभः प्रसन्न-मूर्तिः
अगणित फल-दायकः प्रभुर्-मॆ
जगद्-अधिकॊ हृदि राज-शॆखरॊस्ति 70

आरूढ-भक्ति-गुण-कुन्चित-भाव-चाप-
युक्तैः-शिव-स्मरण-बाण-गणैर्-अमॊघैः
निर्जित्य किल्बिश-रिपून् विजयी सुधीन्द्रः-
सानन्दम्-आवहति सुस्थिर-राज-लक्श्मीम् 71

ध्यानान्जनॆन समवॆक्श्य तमः-प्रदॆशं
भित्वा महा-बलिभिर्-ईश्वर नाम-मन्त्रैः
दिव्याश्रितं भुजग-भूशणम्-उद्वहन्ति
यॆ पाद-पद्मम्-इह तॆ शिव तॆ कृतार्थाः 72

भू-दारताम्-उदवहद्-यद्-अपॆक्शया श्री-
भू-दार ऎव किमतः सुमतॆ लभस्व
कॆदारम्-आकलित मुक्ति महौशधीनां
पादारविन्द भजनं परमॆश्वरस्य 73

आशा-पाश-क्लॆश-दुर्-वासनादि-
भॆदॊद्युक्तैर्-दिव्य-गन्धैर्-अमन्दैः
आशा-शाटीकस्य पादारविन्दं
चॆतः-पॆटीं वासितां मॆ तनॊतु 74

कल्याणिनं सरस-चित्र-गतिं सवॆगं
सर्वॆन्गितज्नम्-अनघं ध्रुव-लक्शणाढ्यम्
चॆतस्-तुरन्गम्-अधिरुह्य चर स्मरारॆ
नॆतः-समस्त जगतां वृशभाधिरूढ 75

भक्तिर्-महॆश-पद-पुश्करम्-आवसन्ती
कादम्बिनीव कुरुतॆ परितॊश-वर्शम्
सम्पूरितॊ भवति यस्य मनस्-तटाकस्-
तज्-जन्म-सस्यम्-अखिलं सफलं च नान्यत् 76

बुद्धिः-स्थिरा भवितुम्-ईश्वर-पाद-पद्म
सक्ता वधूर्-विरहिणीव सदा स्मरन्ती
सद्-भावना-स्मरण-दर्शन-कीर्तनादि
सम्मॊहितॆव शिव-मन्त्र-जपॆन विन्तॆ 77

सद्-उपचार-विधिशु-अनु-बॊधितां
सविनयां सुहृदं सदुपाश्रिताम्
मम समुद्धर बुद्धिम्-इमां प्रभॊ
वर-गुणॆन नवॊढ-वधूम्-इव 78

नित्यं यॊगि-मनह्-सरॊज-दल-सन्चार-क्शमस्-त्वत्-क्रमः-
शम्भॊ तॆन कथं कठॊर-यम-राड्-वक्शः-कवाट-क्शतिः
अत्यन्तं मृदुलं त्वद्-अन्घ्रि-युगलं हा मॆ मनश्-चिन्तयति-
ऎतल्-लॊचन-गॊचरं कुरु विभॊ हस्तॆन संवाहयॆ 79

ऎश्यत्यॆश जनिं मनॊ(अ)स्य कठिनं तस्मिन्-नटानीति मद्-
रक्शायै गिरि सीम्नि कॊमल-पद-न्यासः पुराभ्यासितः
नॊ-चॆद्-दिव्य-गृहान्तरॆशु सुमनस्-तल्पॆशु वॆद्यादिशु
प्रायः-सत्सु शिला-तलॆशु नटनं शम्भॊ किमर्थं तव 80

कन्चित्-कालम्-उमा-महॆश भवतः पादारविन्दार्चनैः
कन्चिद्-ध्यान-समाधिभिश्-च नतिभिः कन्चित् कथाकर्णनैः
कन्चित् कन्चिद्-अवॆक्शणैश्-च नुतिभिः कन्चिद्-दशाम्-ईदृशीं
यः प्राप्नॊति मुदा त्वद्-अर्पित मना जीवन् स मुक्तः खलु 81

बाणत्वं वृशभत्वम्-अर्ध-वपुशा भार्यात्वम्-आर्या-पतॆ
घॊणित्वं सखिता मृदन्ग वहता चॆत्यादि रूपं दधौ
त्वत्-पादॆ नयनार्पणं च कृतवान् त्वद्-दॆह भागॊ हरिः
पूज्यात्-पूज्य-तरः-स ऎव हि न चॆत् कॊ वा तदन्यॊ(अ)धिकः 82

जनन-मृति-युतानां सॆवया दॆवतानां
न भवति सुख-लॆशः संशयॊ नास्ति तत्र
अजनिम्-अमृत रूपं साम्बम्-ईशं भजन्तॆ
य इह परम सौख्यं तॆ हि धन्या लभन्तॆ 83

शिव तव परिचर्या सन्निधानाय गौर्या
भव मम गुण-धुर्यां बुद्धि-कन्यां प्रदास्यॆ
सकल-भुवन-बन्धॊ सच्चिद्-आनन्द-सिन्धॊ
सदय हृदय-गॆहॆ सर्वदा संवस त्वम् 84

जलधि मथन दक्शॊ नैव पाताल भॆदी
न च वन मृगयायां नैव लुब्धः प्रवीणः
अशन-कुसुम-भूशा-वस्त्र-मुख्यां सपर्यां
कथय कथम्-अहं तॆ कल्पयानीन्दु-मौलॆ 85

पूजा-द्रव्य-समृद्धयॊ विरचिताः पूजां कथं कुर्महॆ
पक्शित्वं न च वा कीटित्वम्-अपि न प्राप्तं मया दुर्-लभम्
जानॆ मस्तकम्-अन्घ्रि-पल्लवम्-उमा-जानॆ न तॆ(अ)हं विभॊ
न ज्नातं हि पितामहॆन हरिणा तत्त्वॆन तद्-रूपिणा 86

अशनं गरलं फणी कलापॊ
वसनं चर्म च वाहनं महॊक्शः
मम दास्यसि किं किम्-अस्ति शम्भॊ
तव पादाम्बुज-भक्तिम्-ऎव दॆहि 87

यदा कृताम्भॊ-निधि-सॆतु-बन्धनः
करस्थ-लाधः-कृत-पर्वताधिपः
भवानि तॆ लन्घित-पद्म-सम्भवस्-
तदा शिवार्चा-स्तव भावन-क्शमः 88

नतिभिर्-नुतिभिस्-त्वम्-ईश पूजा
विधिभिर्-ध्यान-समाधिभिर्-न तुश्टः
धनुशा मुसलॆन चाश्मभिर्-वा
वद तॆ प्रीति-करं तथा करॊमि 89

वचसा चरितं वदामि शम्भॊर्-
अहम्-उद्यॊग विधासु तॆ(अ)प्रसक्तः
मनसाकृतिम्-ईश्वरस्य सॆवॆ
शिरसा चैव सदाशिवं नमामि 90

आद्या(अ)विद्या हृद्-गता निर्गतासीत्-
विद्या हृद्या हृद्-गता त्वत्-प्रसादात्
सॆवॆ नित्यं श्री-करं त्वत्-पदाब्जं
भावॆ मुक्तॆर्-भाजनं राज-मौलॆ 91

दूरीकृतानि दुरितानि दुरक्शराणि
दौर्-भाग्य-दुःख-दुरहङ्कृति-दुर्-वचांसि
सारं त्वदीय चरितं नितरां पिबन्तं
गौरीश माम्-इह समुद्धर सत्-कटाक्शैः 92

सॊम कला-धर-मौलौ
कॊमल घन-कन्धरॆ महा-महसि
स्वामिनि गिरिजा नाथॆ
मामक हृदयं निरन्तरं रमताम् 93

सा रसना तॆ नयनॆ
तावॆव करौ स ऎव कृत-कृत्यः
या यॆ यौ यॊ भर्गं
वदतीक्शॆतॆ सदार्चतः स्मरति 94

अति मृदुलौ मम चरणौ-
अति कठिनं तॆ मनॊ भवानीश
इति विचिकित्सां सन्त्यज
शिव कथम्-आसीद्-गिरौ तथा प्रवॆशः 95

धैयान्कुशॆन निभृतं
रभसाद्-आकृश्य भक्ति-शृन्खलया
पुर-हर चरणालानॆ
हृदय-मदॆभं बधान चिद्-यन्त्रैः 96

प्रचरत्यभितः प्रगल्भ-वृत्त्या
मदवान्-ऎश मनः-करी गरीयान्
परिगृह्य नयॆन भक्ति-रज्ज्वा
परम स्थाणु-पदं दृढं नयामुम् 97

सर्वालन्कार-युक्तां सरल-पद-युतां साधु-वृत्तां सुवर्णां
सद्भिः-सम्स्तूय-मानां सरस गुण-युतां लक्शितां लक्शणाढ्याम्
उद्यद्-भूशा-विशॆशाम्-उपगत-विनयां द्यॊत-मानार्थ-रॆखां
कल्याणीं दॆव गौरी-प्रिय मम कविता-कन्यकां त्वं गृहाण 98

इदं तॆ युक्तं वा परम-शिव कारुण्य जलधॆ
गतौ तिर्यग्-रूपं तव पद-शिरॊ-दर्शन-धिया
हरि-ब्रह्माणौ तौ दिवि भुवि चरन्तौ श्रम-युतौ
कथं शम्भॊ स्वामिन् कथय मम वॆद्यॊसि पुरतः 99

स्तॊत्रॆणालम्-अहं प्रवच्मि न मृशा दॆवा विरिन्चादयः
स्तुत्यानां गणना-प्रसन्ग-समयॆ त्वाम्-अग्रगण्यं विदुः
माहात्म्याग्र-विचारण-प्रकरणॆ धाना-तुशस्तॊमवद्-
धूतास्-त्वां विदुर्-उत्तमॊत्तम फलं शम्भॊ भवत्-सॆवकाः 100

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निर्वाण शतकम

Saturday, August 27th, 2011

निर्वाण शतकम – Nirvaana Shatkam

शिवॊहं शिवॊहं, शिवॊहं शिवॊहं, शिवॊहं शिवॊहं

मनॊ बुध्यहङ्कार चित्तानि नाहं
न च श्रॊत्र जिह्वा न च घ्राणनॆत्रम् ।
न च व्यॊम भूमिर्-न तॆजॊ न वायुः
चिदानन्द रूपः शिवॊहं शिवॊहम् ॥ 1 ॥

अहं प्राण सञ्ज्ञॊ न वैपञ्च वायुः
न वा सप्तधातुर्-न वा पञ्च कॊशाः ।
नवाक्पाणि पादौ न चॊपस्थ पायू
चिदानन्द रूपः शिवॊहं शिवॊहम् ॥ 2 ॥

न मॆ द्वॆषरागौ न मॆ लॊभमॊहॊ
मदॊ नैव मॆ नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मॊ न चार्धॊ न कामॊ न मॊक्षः
चिदानन्द रूपः शिवॊहं शिवॊहम् ॥ 3 ॥

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रॊ न तीर्धं न वॆदा न यज्ञः ।
अहं भॊजनं नैव भॊज्यं न भॊक्ता
चिदानन्द रूपः शिवॊहं शिवॊहम् ॥ 4 ॥

अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ
विभूत्वाच्च सर्वत्र सर्वॆन्द्रियाणाम् ।
न वा बन्धनं नैव मुक्ति न बन्धः ।
चिदानन्द रूपः शिवॊहं शिवॊहम् ॥ 5 ॥

न मृत्युर्-न शङ्का न मॆ जाति भॆदः
पिता नैव मॆ नैव माता न जन्म ।
न बन्धुर्-न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्द रूपः शिवॊहं शिवॊहम् ॥ 6 ॥

शिवॊहं शिवॊहं, शिवॊहं शिवॊहं, शिवॊहं शिवॊहं

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श्री शिव पंचाक्षरी स्तोत्रम

Saturday, August 27th, 2011

  

श्री शिव  पंचाक्षरी स्तोत्रम – Shiva Panchakshari Stotram

ॐ नमः शिवाय शिवाय नमः ॐ
ॐ नमः शिवाय शिवाय नमः ॐ

नागॆन्द्रहाराय त्रिलॊचनाय
भस्माङ्गरागाय महॆश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै “न” काराय नमः शिवाय ॥ 1 ॥

मन्दाकिनी सलिल चन्दन चर्चिताय
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महॆश्वराय ।
मन्दार मुख्य बहुपुष्प सुपूजिताय
तस्मै “म” काराय नमः शिवाय ॥ 2 ॥

शिवाय गौरी वदनाब्ज बृन्द
सूर्याय दक्षाध्वर नाशकाय ।
श्री नीलकण्ठाय वृषभध्वजाय
तस्मै “शि” काराय नमः शिवाय ॥ 3 ॥

वशिष्ठ कुम्भॊद्भव गौतमार्य
मुनीन्द्र दॆवार्चित शॆखराय ।
चन्द्रार्क वैश्वानर लॊचनाय
तस्मै “व” काराय नमः शिवाय ॥ 4 ॥

यज्ञ स्वरूपाय जटाधराय
पिनाक हस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय दॆवाय दिगम्बराय
तस्मै “य” काराय नमः शिवाय ॥ 5 ॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठॆच्छिव सन्निधौ ।
शिवलॊकमवाप्नॊति शिवॆन सह मॊदतॆ ॥

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श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम

Saturday, August 27th, 2011

  

श्री काशी विश्वनाथाष्टकम – Sri Kasi Vishwanathashtakam

गङ्गा तरङ्ग रमणीय जटा कलापं
गौरी निरन्तर विभूषित वाम भागं
नारायण प्रियमनङ्ग मदापहारं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 1 ॥

वाचामगॊचरमनॆक गुण स्वरूपं
वागीश विष्णु सुर सॆवित पाद पद्मं
वामॆण विग्रह वरॆन कलत्रवन्तं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 2 ॥

भूतादिपं भुजग भूषण भूषिताङ्गं
व्याघ्राञ्जिनां बरधरं, जटिलं, त्रिनॆत्रं
पाशाङ्कुशाभय वरप्रद शूलपाणिं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 3 ॥

सीतांशु शॊभित किरीट विराजमानं
बालॆक्षणातल विशॊषित पञ्चबाणं
नागाधिपा रचित बासुर कर्ण पूरं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 4 ॥

पञ्चाननं दुरित मत्त मतङ्गजानां
नागान्तकं धनुज पुङ्गव पन्नागानां
दावानलं मरण शॊक जराटवीनां
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 5 ॥

तॆजॊमयं सगुण निर्गुणमद्वितीयं
आनन्द कन्दमपराजित मप्रमॆयं
नागात्मकं सकल निष्कलमात्म रूपं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 6 ॥

आशां विहाय परिहृत्य परश्य निन्दां
पापॆ रथिं च सुनिवार्य मनस्समाधौ
आधाय हृत्-कमल मध्य गतं परॆशं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 7 ॥

रागाधि दॊष रहितं स्वजनानुरागं
वैराग्य शान्ति निलयं गिरिजा सहायं
माधुर्य धैर्य सुभगं गरलाभिरामं
वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम् ॥ 8 ॥

वाराणसी पुर पतॆ स्थवनं शिवस्य
व्याख्यातम् अष्टकमिदं पठतॆ मनुष्य
विद्यां श्रियं विपुल सौख्यमनन्त कीर्तिं
सम्प्राप्य दॆव निलयॆ लभतॆ च मॊक्षम् ॥

विश्वनाधाष्टकमिदं पुण्यं यः पठॆः शिव सन्निधौ
शिवलॊकमवाप्नॊति शिवॆनसह मॊदतॆ ॥

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चन्द्रसेखारा अष्टकम

Saturday, August 27th, 2011

  

श्री चन्द्र सेखाराश्ताकम – Sri Chandra Sekharashtakam 

चन्द्रशॆखर चन्द्रशॆखर चन्द्रशॆखर पाहिमाम् ।
चन्द्रशॆखर चन्द्रशॆखर चन्द्रशॆखर रक्षमाम् ॥

रत्नसानु शरासनं रजताद्रि शृङ्ग निकॆतनं
शिञ्जिनीकृत पन्नगॆश्वर मच्युतानल सायकम् ।
क्षिप्रदग्द पुरत्रयं त्रिदशालयै रभिवन्दितं
चन्द्रशॆखरमाश्रयॆ मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 1 ॥

मत्तवारण मुख्यचर्म कृतॊत्तरीय मनॊहरं
पङ्कजासन पद्मलॊचन पूजिताङ्घ्रि सरॊरुहम् ।
दॆव सिन्धु तरङ्ग श्रीकर सिक्त शुभ्र जटाधरं
चन्द्रशॆखरमाश्रयॆ मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 2 ॥

कुण्डलीकृत कुण्डलीश्वर कुण्डलं वृषवाहनं
नारदादि मुनीश्वर स्तुतवैभवं भुवनॆश्वरम् ।
अन्धकान्तक माश्रितामर पादपं शमनान्तकं
चन्द्रशॆखरमाश्रयॆ मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 3 ॥

पञ्चपादप पुष्पगन्ध पदाम्बुज द्वयशॊभितं
फाललॊचन जातपावक दग्ध मन्मध विग्रहम् ।
भस्मदिग्द कलॆबरं भवनाशनं भव मव्ययं
चन्द्रशॆखरमाश्रयॆ मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 4 ॥

यक्ष राजसखं भगाक्ष हरं भुजङ्ग विभूषणम्
शैलराज सुता परिष्कृत चारुवाम कलॆबरम् ।
क्षॆल नीलगलं परश्वध धारिणं मृगधारिणम्
चन्द्रशॆखरमाश्रयॆ मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 5 ॥

भॆषजं भवरॊगिणा मखिलापदा मपहारिणं
दक्षयज्ञ विनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलॊचनम् ।
भुक्ति मुक्ति फलप्रदं सकलाघ सङ्घ निबर्हणं
चन्द्रशॆखरमाश्रयॆ मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 6 ॥

विश्वसृष्टि विधायकं पुनरॆवपालन तत्परं
संहरं तमपि प्रपञ्च मशॆषलॊक निवासिनम् ।
क्रीडयन्त महर्निशं गणनाथ यूथ समन्वितं
चन्द्रशॆखरमाश्रयॆ मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 7 ॥

भक्तवत्सल मर्चितं निधिमक्षयं हरिदम्बरं
सर्वभूत पतिं परात्पर मप्रमॆय मनुत्तमम् ।
सॊमवारिन भॊहुताशन सॊम पाद्यखिलाकृतिं
चन्द्रशॆखर ऎव तस्य ददाति मुक्ति मयत्नतः ॥ 8 ॥

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श्री शिव रुद्रं नमकम – चमकम

Saturday, August 27th, 2011

श्री शिव रुद्रं नमकम – Sri Rudram Namakam

श्री रुद्र प्रश्नः

कृष्ण यजुर्वॆदीय तैत्तिरीय संहिता
चतुर्थं वैश्वदॆवं काण्डम् पञ्चमः प्रपाठकः

ॐ नमॊ भगवतॆ॑ रुद्राय ॥
नम॑स्तॆ रुद्र म॒न्यव॑ उ॒तॊत॒ इष॑वॆ॒ नमः॑ । नम॑स्तॆ अस्तु॒ धन्व॑नॆ बा॒हुभ्या॑मु॒त तॆ॒ नमः॑ । या त॒ इषुः॑ शि॒वत॑मा शि॒वं ब॒भूव॑ तॆ॒ धनुः॑ । शि॒वा श॑र॒व्या॑ या तव॒ तया॑ नॊ रुद्र मृडय । या तॆ॑ रुद्र शि॒वा त॒नूरघॊ॒रा‌உपा॑पकाशिनी । तया॑ नस्त॒नुवा॒ शन्त॑मया॒ गिरि॑शन्ता॒भिचा॑कशीहि । यामिषुं॑ गिरिशन्त॒ हस्तॆ॒ बिभ॒र्ष्यस्त॑वॆ । शि॒वां गि॑रित्र॒ तां कु॑रु॒ मा हिग्ं॑सीः॒ पुरु॑षं॒ जग॑त्। शि॒वॆन॒ वच॑सा त्वा॒ गिरि॒शाच्छा॑वदामसि । यथा॑ नः॒ सर्व॒मिज्जग॑दय॒क्ष्मग्ं सु॒मना॒ अस॑त् । अध्य॑वॊचदधिव॒क्ता प्र॑थ॒मॊ दैव्यॊ॑ भि॒षक् । अहीग्॑‍श्च॒ सर्वां॓ज॒म्भय॒न्त्सर्वा॓श्च यातुधा॒न्यः॑ । अ॒सौ यस्ता॒म्रॊ अ॑रु॒ण उ॒त ब॒भ्रुः सु॑म॒ङ्गलः॑ । यॆ चॆ॒माग्ं रु॒द्रा अ॒भितॊ॑ दि॒क्षु श्रि॒ताः स॑हस्र॒शॊ‌உवैषा॒ग्॒ं॒ हॆड॑ ईमहॆ । अ॒सौ यॊ॑‌உवसर्प॑ति॒ नील॑ग्रीवॊ॒ विलॊ॑हितः । उ॒तैनं॑ गॊ॒पा अ॑दृश॒न्-नदृ॑शन्-नुदहा॒र्यः॑ । उ॒तैनं॒ विश्वा॑ भू॒तानि॒ स दृ॒ष्टॊ मृ॑डयाति नः । नमॊ॑ अस्तु नील॑ग्रीवाय सहस्रा॒क्षाय॒ मी॒ढुषॆ॓ । अथॊ॒ यॆ अ॑स्य॒ सत्वा॑नॊ॒‌உहं तॆभ्यॊ॑‌உकर॒न्नमः॑ । प्रमुं॑च॒ धन्व॑न॒स्-त्व॒मु॒भयॊ॒रार्त्नि॑ यॊ॒र्ज्याम् । याश्च तॆ॒ हस्त॒ इष॑वः॒ परा॒ ता भ॑गवॊ वप । अ॒व॒तत्य॒ धनु॒स्त्वग्ं सह॑स्राक्ष॒ शतॆ॑षुधॆ । नि॒शीर्य॑ श॒ल्यानां॒ मुखा॑ शि॒वॊ नः॑ सु॒मना॑ भव । विज्यं॒ धनुः॑ कप॒र्दिनॊ॒ विश॑ल्यॊ॒ बाण॑वाग्म् उ॒त । अनॆ॑श॒न्-नस्यॆष॑व आ॒भुर॑स्य निष॒ङ्गथिः॑ । या तॆ॑ हॆ॒तिर्-मी॑डुष्टम॒ हस्तॆ॑ ब॒भूव॑ तॆ॒ धनुः॑ । तया॒‌உस्मान्, वि॒श्वत॒स्-त्वम॑य॒क्ष्मया॒ परि॑ब्भुज । नम॑स्तॆ अ॒स्त्वायुधा॒याना॑तताय धृ॒ष्णवॆ॓ । उ॒भाभ्या॑मु॒त तॆ॒ नमॊ॑ बा॒हुभ्यां॒ तव॒ धन्व॑नॆ । परि॑ तॆ॒ धन्व॑नॊ हॆ॒तिर॒स्मान्-वृ॑णक्तु वि॒श्वतः॑ । अथॊ॒ य इ॑षु॒धिस्तवा॒रॆ अ॒स्मन्निधॆ॑हि॒ तम् ॥ 1 ॥

शम्भ॑वॆ॒ नमः॑ । नम॑स्तॆ अस्तु भगवन्-विश्वॆश्व॒राय॑ महादॆ॒वाय॑ त्र्यम्ब॒काय॑ त्रिपुरान्त॒काय॑ त्रिकाग्निका॒लाय॑ कालाग्निरु॒द्राय॑ नील॒कण्ठाय॑ मृत्युञ्ज॒याय॑ सर्वॆश्व॑राय॑ सदाशि॒वाय॑ श्रीमन्-महादॆ॒वाय॒ नमः॑ ॥

नमॊ॒ हिर॑ण्य बाहवॆ सॆना॒न्यॆ॑ दि॒शां च॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ वृ॒क्षॆभ्यॊ॒ हरि॑कॆशॆभ्यः पशू॒नां पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमः॑ स॒स्पिञ्ज॑राय॒ त्विषी॑मतॆ पथी॒नां पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ बभ्लु॒शाय॑ विव्या॒धिनॆ‌உन्ना॑नां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॒ हरि॑कॆशायॊपवी॒तिनॆ॑ पु॒ष्टानां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ भ॒वस्य॑ हॆ॒त्यै जग॑तां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ रु॒द्राया॑तता॒विनॆ॒ क्षॆत्रा॑णां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमः॑ सू॒तायाहं॑त्याय॒ वना॑नां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॒ रॊहि॑ताय स्थ॒पत॑यॆ वृ॒क्षाणां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ म॒न्त्रिणॆ॑ वाणि॒जाय॒ कक्षा॑णां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ भुव॒न्तयॆ॑ वारिवस्कृ॒ता-यौष॑धीनां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नम॑ उ॒च्चैर्-घॊ॑षायाक्र॒न्दय॑तॆ पत्ती॒नां पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमः॑ कृत्स्नवी॒ताय॒ धाव॑तॆ॒ सत्त्व॑नां॒ पत॑यॆ॒ नमः॑ ॥ 2 ॥

नमः॒ सह॑मानाय निव्या॒धिन॑ आव्या॒धिनी॑नां॒ पत॑यॆ नमॊ॒ नमः॑ ककु॒भाय॑ निष॒ङ्गिणॆ॓ स्तॆ॒नानां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ निष॒ङ्गिण॑ इषुधि॒मतॆ॑ तस्क॑राणां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॒ वञ्च॑तॆ परि॒वञ्च॑तॆ स्तायू॒नां पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ निचॆ॒रवॆ॑ परिच॒रायार॑ण्यानां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमः॑ सृका॒विभ्यॊ॒ जिघाग्ं॑सद्भ्यॊ मुष्ण॒तां पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नमॊ॑‌உसि॒मद्भ्यॊ॒ नक्त॒ञ्चर॑द्भ्यः प्रकृ॒न्तानां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नम॑ उष्णी॒षिनॆ॑ गिरिच॒राय॑ कुलु॒ञ्चानां॒ पत॑यॆ॒ नमॊ॒ नम॒ इषु॑मद्भ्यॊ धन्वा॒विभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नम॑ आतन्-वा॒नॆभ्यः॑ प्रति॒दधा॑नॆभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नम॑ आ॒यच्छ॒॑द्भ्यॊ विसृ॒जद्-भ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ‌உस्स॑द्भ्यॊ॒ विद्य॑द्-भ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नम॒ आसी॑नॆभ्यः॒ शया॑नॆभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमः॑ स्व॒पद्भ्यॊ॒ जाग्र॑द्-भ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नम॒स्तिष्ठ॑द्भ्यॊ॒ धाव॑द्-भ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमः॑ स॒भाभ्यः॑ स॒भाप॑तिभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॒ अश्वॆ॒भ्यॊ‌உश्व॑पतिभ्यश्च वॊ॒ नमः॑ ॥ 3 ॥

नम॑ आव्या॒धिनी॓भ्यॊ वि॒विध्य॑न्तीभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नम॒ उग॑णाभ्यस्तृगं-ह॒तीभ्यश्च॑ वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ गृ॒त्सॆभ्यॊ॑ गृ॒त्सप॑तिभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॒ व्रातॆ॓भ्यॊ॒ व्रात॑पतिभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ ग॒णॆभ्यॊ॑ ग॒णप॑तिभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॒ विरू॑पॆभ्यॊ वि॒श्वरू॑पॆभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ मह॒द्भ्यः॑, क्षुल्ल॒कॆभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ र॒थिभ्यॊ॒‌உर॒थॆभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॒ रथॆ॓भ्यॊ॒ रथ॑पतिभ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमः॑ सॆना॓भ्यः सॆना॒निभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नमः॑, क्ष॒त्तृभ्यः॑ सङ्ग्रही॒तृभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नम॒स्तक्ष॑भ्यॊ रथका॒रॆभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॑ नमः॒ कुला॑लॆभ्यः क॒र्मारॆ॓भ्यश्च वॊ॒ नमॊ॒ नमः॑ पु॒ञ्जिष्टॆ॓भ्यॊ निषा॒दॆभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नमः॑ इषु॒कृद्भ्यॊ॑ धन्व॒कृद्-भ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नमॊ॑ मृग॒युभ्यः॑ श्व॒निभ्य॑श्च वॊ॒ नमॊ॒ नमः॒ श्वभ्यः॒ श्वप॑तिभ्यश्च वॊ॒ नमः॑ ॥ 4 ॥

नमॊ॑ भ॒वाय॑ च रु॒द्राय॑ च॒ नमः॑ श॒र्वाय॑ च पशु॒पत॑यॆ च॒ नमॊ॒ नील॑ग्रीवाय च शिति॒कण्ठा॑य च॒ नमः॑ कप॒र्धिनॆ॑ च॒ व्यु॑प्तकॆशाय च॒ नमः॑ सहस्रा॒क्षाय॑ च श॒तध॑न्वनॆ च॒ नमॊ॑ गिरि॒शाय॑ च शिपिवि॒ष्टाय॑ च॒ नमॊ॑ मी॒ढुष्ट॑माय॒ चॆषु॑मतॆ च॒ नमॊ॓ ह्र॒स्वाय॑ च वाम॒नाय॑ च॒ नमॊ॑ बृह॒तॆ च॒ वर्षी॑यसॆ च॒ नमॊ॑ वृ॒द्धाय॑ च स॒ंवृध्व॑नॆ च॒ नमॊ॒ अग्रि॑याय च प्रथ॒माय॑ च॒ नम॑ आ॒शवॆ॑ चाजि॒राय॑ च॒ नमः॒ शीघ्रि॑याय च॒ शीभ्या॑य च॒ नम॑ ऊ॒र्म्या॑य चावस्व॒न्या॑य च॒ नमः॑ स्त्रॊत॒स्या॑य च॒ द्वीप्या॑य च ॥ 5 ॥

नमॊ॓ ज्यॆ॒ष्ठाय॑ च कनि॒ष्ठाय॑ च॒ नमः॑ पूर्व॒जाय॑ चापर॒जाय॑ च॒ नमॊ॑ मध्य॒माय॑ चापग॒ल्भाय॑ च॒ नमॊ॑ जघ॒न्या॑य च॒ बुध्नि॑याय च॒ नमः॑ सॊ॒भ्या॑य च प्रतिस॒र्या॑य च॒ नमॊ॒ याम्या॑य च॒ क्षॆम्या॑य च॒ नम॑ उर्व॒र्या॑य च॒ खल्या॑य च॒ नमः॒ श्लॊक्या॑य चा‌உवसा॒न्या॑य च॒ नमॊ॒ वन्या॑य च॒ कक्ष्या॑य च॒ नमः॑ श्र॒वाय॑ च प्रतिश्र॒वाय॑ च॒ नम॑ आ॒शुषॆ॑णाय चा॒शुर॑थाय च॒ नमः॒ शूरा॑य चावभिन्द॒तॆ च॒ नमॊ॑ व॒र्मिणॆ॑ च वरू॒धिनॆ॑ च॒ नमॊ॑ बि॒ल्मिनॆ॑ च कव॒चिनॆ॑ च॒ नमः॑ श्रु॒ताय॑ च श्रुतसॆ॑नाय॒ च ॥ 6 ॥

नमॊ॑ दुन्दु॒भ्या॑य चाहन॒न्या॑य च॒ नमॊ॑ धृ॒ष्णवॆ॑ च प्रमृ॒शाय॑ च॒ नमॊ॑ दू॒ताय॑ च प्रहि॑ताय च॒ नमॊ॑ निष॒ङ्गिणॆ॑ चॆषुधि॒मतॆ॑ च॒ नम॑स्-ती॒क्ष्णॆष॑वॆ चायु॒धिनॆ॑ च॒ नमः॑ स्वायु॒धाय॑ च सु॒धन्व॑नॆ च॒ नमः॒ स्रुत्या॑य च॒ पथ्या॑य च॒ नमः॑ का॒ट्या॑य च नी॒प्या॑य च॒ नमः॒ सूद्या॑य च सर॒स्या॑य च॒ नमॊ॑ ना॒द्याय॑ च वैश॒न्ताय॑ च॒ नमः॒ कूप्या॑य चाव॒ट्या॑य च॒ नमॊ॒ वर्ष्या॑य चाव॒र्ष्याय॑ च॒ नमॊ॑ मॆ॒घ्या॑य च विद्यु॒त्या॑य च॒ नम ई॒ध्रिया॑य चात॒प्या॑य च॒ नमॊ॒ वात्या॑य च॒ रॆष्मि॑याय च॒ नमॊ॑ वास्त॒व्या॑य च वास्तु॒पाय॑ च ॥ 7 ॥

नमः॒ सॊमा॑य च रु॒द्राय॑ च॒ नम॑स्ता॒म्राय॑ चारु॒णाय॑ च॒ नमः॑ श॒ङ्गाय॑ च पशु॒पत॑यॆ च॒ नम॑ उ॒ग्राय॑ च भी॒माय॑ च॒ नमॊ॑ अग्रॆव॒धाय॑ च दूरॆव॒धाय॑ च॒ नमॊ॑ ह॒न्त्रॆ च॒ हनी॑यसॆ च॒ नमॊ॑ वृ॒क्षॆभ्यॊ॒ हरि॑कॆशॆभ्यॊ॒ नम॑स्ता॒राय॒ नम॑श्श॒म्भवॆ॑ च मयॊ॒भवॆ॑ च॒ नमः॑ शङ्क॒राय॑ च मयस्क॒राय॑ च॒ नमः॑ शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च॒ नम॒स्तीर्थ्या॑य च॒ कूल्या॑य च॒ नमः॑ पा॒र्या॑य चावा॒र्या॑य च॒ नमः॑ प्र॒तर॑णाय चॊ॒त्तर॑णाय च॒ नम॑ आता॒र्या॑य चाला॒द्या॑य च॒ नमः॒ शष्प्या॑य च॒ फॆन्या॑य च॒ नमः॑ सिक॒त्या॑य च प्रवा॒ह्या॑य च ॥ 8 ॥

नम॑ इरि॒ण्या॑य च प्रप॒थ्या॑य च॒ नमः॑ किग्ंशि॒लाय॑ च॒ क्षय॑णाय च॒ नमः॑ कप॒र्दिनॆ॑ च॒ पुल॒स्तयॆ॑ च॒ नमॊ॒ गॊष्ठ्या॑य च॒ गृह्या॑य च॒ नम॒स्-तल्प्या॑य च॒ गॆह्या॑य च॒ नमः॑ का॒ट्या॑य च गह्वरॆ॒ष्ठाय॑ च॒ नमॊ॓ हृद॒य्या॑य च निवॆ॒ष्प्या॑य च॒ नमः॑ पाग्ं स॒व्या॑य च रज॒स्या॑य च॒ नमः॒ शुष्क्या॑य च हरि॒त्या॑य च॒ नमॊ॒ लॊप्या॑य चॊल॒प्या॑य च॒ नम॑ ऊ॒र्म्या॑य च सू॒र्म्या॑य च॒ नमः॑ प॒र्ण्याय च पर्णश॒द्या॑य च॒ नमॊ॑‌உपगु॒रमा॑णाय चाभिघ्न॒तॆ च॒ नम॑ आख्खिद॒तॆ च॒ प्रख्खिद॒तॆ च॒ नमॊ॑ वः किरि॒कॆभ्यॊ॑ दॆ॒वाना॒ग्ं॒ हृद॑यॆभ्यॊ॒ नमॊ॑ विक्षीण॒कॆभ्यॊ॒ नमॊ॑ विचिन्व॒त्-कॆभ्यॊ॒ नम॑ आनिर् ह॒तॆभ्यॊ॒ नम॑ आमीव॒त्-कॆभ्यः॑ ॥ 9 ॥

द्रापॆ॒ अन्ध॑सस्पतॆ॒ दरि॑द्र॒न्-नील॑लॊहित । ऎ॒षां पुरु॑षाणामॆ॒षां प॑शू॒नां मा भॆर्मा‌உरॊ॒ मॊ ऎ॑षां॒ किञ्च॒नाम॑मत् । या तॆ॑ रुद्र शि॒वा त॒नूः शि॒वा वि॒श्वाह॑भॆषजी । शि॒वा रु॒द्रस्य॑ भॆष॒जी तया॑ नॊ मृड जी॒वसॆ॓ ॥ इ॒माग्ं रु॒द्राय॑ त॒वसॆ॑ कप॒र्दिनॆ॓ क्ष॒यद्वी॑राय॒ प्रभ॑रामहॆ म॒तिम् । यथा॑ नः॒ शमस॑द् द्वि॒पदॆ॒ चतु॑ष्पदॆ॒ विश्वं॑ पु॒ष्टं ग्रामॆ॑ अ॒स्मिन्नना॑तुरम् । मृ॒डा नॊ॑ रुद्रॊ॒त नॊ॒ मय॑स्कृधि क्ष॒यद्वी॑राय॒ नम॑सा विधॆम तॆ । यच्छं च॒ यॊश्च॒ मनु॑राय॒जॆ पि॒ता तद॑श्याम॒ तव॑ रुद्र॒ प्रणी॑तौ । मा नॊ॑ म॒हान्त॑मु॒त मा नॊ॑ अर्भ॒कं मा न॒ उक्ष॑न्तमु॒त मा न॑ उक्षि॒तम् । मा नॊ॑‌உवधीः पि॒तरं॒ मॊत मा॒तरं॑ प्रि॒या मा न॑स्त॒नुवॊ॑ रुद्र रीरिषः । मा न॑स्तॊ॒कॆ तन॑यॆ॒ मा न॒ आयु॑षि॒ मा नॊ॒ गॊषु॒ मा नॊ॒ अश्वॆ॑षु रीरिषः । वी॒रान्मा नॊ॑ रुद्र भामि॒तॊ‌உव॑धीर्-ह॒विष्म॑न्तॊ॒ नम॑सा विधॆम तॆ । आ॒रात्तॆ॑ गॊ॒घ्न उ॒त पू॑रुष॒घ्नॆ क्ष॒यद्वी॑राय सु॒म्-नम॒स्मॆ तॆ॑ अस्तु । रक्षा॑ च नॊ॒ अधि॑ च दॆव ब्रू॒ह्यथा॑ च नः॒ शर्म॑ यच्छ द्वि॒बर्हा॓ः । स्तु॒हि श्रु॒तं ग॑र्त॒सदं॒ युवा॑नं मृ॒गन्न भी॒ममु॑पह॒न्तुमु॒ग्रम् । मृ॒डा ज॑रि॒त्रॆ रु॑द्र॒ स्तवा॑नॊ अ॒न्यन्तॆ॑ अ॒स्मन्निव॑पन्तु॒ सॆना॓ः । परि॑णॊ रु॒द्रस्य॑ हॆ॒तिर्-वृ॑णक्तु॒ परि॑ त्वॆ॒षस्य॑ दुर्म॒ति र॑घा॒यॊः । अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्-भ्यस्-तनुष्व मीढ्-व॑स्तॊ॒काय॒ तन॑याय मृडय । मीढु॑ष्टम॒ शिव॑मत शि॒वॊ नः॑ सु॒मना॑ भव । प॒र॒मॆ वृ॒क्ष आयु॑धन्नि॒धाय॒ कृत्तिं॒ वसा॑न॒ आच॑र॒ पिना॑कं॒ बिभ्र॒दाग॑हि । विकि॑रिद॒ विलॊ॑हित॒ नम॑स्तॆ अस्तु भगवः । यास्तॆ॑ स॒हस्रग्ं॑ हॆ॒तयॊ॒न्यम॒स्मन्-निव॒पन्तु ताः । स॒हस्रा॑णि सहस्र॒धा बा॑हु॒वॊस्तव॑ हॆ॒तयः॑ । तासा॒मीशा॑नॊ भगवः परा॒चीना॒ मुखा॑ कृधि ॥ 10 ॥

स॒हस्रा॑णि सहस्र॒शॊ यॆ रु॒द्रा अधि॒ भूम्या॓म् । तॆषाग्ं॑ सहस्रयॊज॒नॆ‌உव॒धन्वा॑नि तन्मसि । अ॒स्मिन्-म॑ह॒त्-य॑र्ण॒वॆ॓‌உन्तरि॑क्षॆ भ॒वा अधि॑ । नील॑ग्रीवाः शिति॒कण्ठा॓ः श॒र्वा अ॒धः, क्ष॑माच॒राः । नील॑ग्रीवाः शिति॒कण्ठा॒ दिवग्ं॑ रु॒द्रा उप॑श्रिताः । यॆ वृ॒क्षॆषु॑ स॒स्पिञ्ज॑रा॒ नील॑ग्रीवा॒ विलॊ॑हिताः । यॆ भू॒ताना॒म्-अधि॑पतयॊ विशि॒खासः॑ कप॒र्दि॑नः । यॆ अन्नॆ॑षु वि॒विध्य॑न्ति॒ पात्रॆ॑षु॒ पिब॑तॊ॒ जनान्॑ । यॆ प॒थां प॑थि॒रक्ष॑य ऐलबृ॒दा॑ य॒व्युधः॑ । यॆ ती॒र्थानि॑ प्र॒चर॑न्ति सृ॒काव॑न्तॊ निष॒ङ्गिणः॑ । य ऎ॒ताव॑न्तश्च॒ भूयाग्ं॑सश्च॒ दिशॊ॑ रु॒द्रा वि॑तस्थि॒रॆ । तॆषाग्ं॑ सहस्रयॊज॒नॆ‌உव॒धन्वा॑नि तन्मसि । नमॊ॑ रु॒ध्रॆभ्यॊ॒ यॆ पृ॑थि॒व्यां यॆ॓‌உन्तरि॑क्षॆ यॆ दि॒वि यॆषा॒मन्नं॒ वातॊ॑ व॒र्-ष॒मिष॑व॒स्-तॆभ्यॊ॒ दश॒ प्राची॒र्दश॑ दक्षि॒णा दश॑ प्र॒तीची॒र्-दशॊ-दी॑ची॒र्-दशॊ॒र्ध्वास्-तॆभ्यॊ॒ नम॒स्तॆ नॊ॑ मृडयन्तु॒ तॆ यं द्वि॒ष्मॊ यश्च॑ नॊ॒ द्वॆष्टि॒ तं वॊ॒ जम्भॆ॑ दधामि ॥ 11 ॥

त्र्यं॑बकं यजामहॆ सुग॒न्धिं पु॑ष्टि॒वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्-मृत्यॊ॑र्-मुक्षीय॒ मा‌உमृता॓त् । यॊ रु॒द्रॊ अ॒ग्नौ यॊ अ॒प्सु य ऒष॑धीषु॒ यॊ रु॒द्रॊ विश्वा॒ भुव॑ना वि॒वॆश॒ तस्मै॑ रु॒द्राय॒ नमॊ॑ अस्तु । तमु॑ ष्टु॒हि॒ यः स्वि॒षुः सु॒धन्वा॒ यॊ विश्व॑स्य॒ क्षय॑ति भॆष॒जस्य॑ । यक्ष्वा॓म॒हॆ सौ॓मन॒साय॑ रु॒द्रं नमॊ॓भिर्-दॆ॒वमसु॑रं दुवस्य । अ॒यं मॆ॒ हस्तॊ॒ भग॑वान॒यं मॆ॒ भग॑वत्तरः । अ॒यं मॆ॓ वि॒श्वभॆ॓षजॊ॒‌உयग्ं शि॒वाभि॑मर्शनः । यॆ तॆ॑ स॒हस्र॑म॒युतं॒ पाशा॒ मृत्यॊ॒ मर्त्या॑य॒ हन्त॑वॆ । तान् य॒ज्ञस्य॑ मा॒यया॒ सर्वा॒नव॑ यजामहॆ । मृ॒त्यवॆ॒ स्वाहा॑ मृ॒त्यवॆ॒ स्वाहा॓ । ॐ नमॊ भगवतॆ रुद्राय विष्णवॆ मृत्यु॑र्मॆ पा॒हि ॥

प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रॊ मा॑ विशा॒न्तकः । तॆनान्नॆना॓प्याय॒स्व ॥

सदाशि॒वॊम् ।

ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑

श्री शिव रुद्रं चमकम  – Sri Rudram Chamakam

ॐ अग्ना॑विष्णॊ स॒जॊष॑सॆ॒माव॑र्धन्तु वां॒ गिरः॑ । द्यु॒म्नैर्-वाजॆ॑भिराग॑तम् । वाज॑श्च मॆ प्रस॒वश्च॑ मॆ॒ प्रय॑तिश्च मॆ॒ प्रसि॑तिश्च मॆ धी॒तिश्च॑ मॆ क्रतु॑श्च मॆ॒ स्वर॑श्च मॆ॒ श्लॊक॑श्च मॆ॒ श्रा॒वश्च॑ मॆ॒ श्रुति॑श्च मॆ॒ ज्यॊति॑श्च मॆ॒ सुव॑श्च मॆ प्रा॒णश्च॑ मॆ‌உपा॒नश्च॑ मॆ व्या॒नश्च॒ मॆ‌உसु॑श्च मॆ चि॒त्तं च॑ म॒ आधी॑तं च मॆ॒ वाक्च॑ मॆ॒ मन॑श्च मॆ॒ चक्षु॑श्च मॆ॒ श्रॊत्रं॑ च मॆ॒ दक्ष॑श्च मॆ॒ बलं॑ च म॒ ऒज॑श्च मॆ॒ सह॑श्च म॒ आयु॑श्च मॆ ज॒रा च॑ म आ॒त्मा च॑ मॆ त॒नूश्च॑ मॆ॒ शर्म॑ च मॆ॒ वर्म॑ च॒ मॆ‌உङ्गा॑नि च मॆ॒‌உस्थानि॑ च मॆ॒ परूग्ं॑षि च मॆ॒ शरी॑राणि च मॆ ॥ 1 ॥

जैष्ठ्यं॑ च म॒ आधि॑पत्यं च मॆ म॒न्युश्च॑ मॆ॒ भाम॑श्च॒ मॆ‌உम॑श्च॒ मॆ‌உम्भ॑श्च मॆ जॆ॒मा च॑ मॆ महि॒मा च॑ मॆ वरि॒मा च॑ मॆ प्रथि॒मा च॑ मॆ व॒र्ष्मा च॑ मॆ द्राघु॒या च॑ मॆ वृ॒द्धं च॑ मॆ॒ वृद्धि॑श्च मॆ स॒त्यं च॑ मॆ श्र॒द्धा च॑ मॆ॒ जग॑च्च मॆ॒ धनं॑ च मॆ॒ वश॑श्च मॆ॒ त्विषि॑श्च मॆ क्री॒डा च॑ मॆ॒ मॊद॑श्च मॆ जा॒तं च॑ मॆ जनि॒ष्यमा॑णं च मॆ सू॒क्तं च॑ मॆ सुकृ॒तं च॑ मॆ वि॒त्तं च॑ मॆ॒ वॆद्यं॑ च मॆ भूतं च॑ मॆ भवि॒ष्यच्च॑ मॆ सु॒गं च॑ मॆ सु॒पथं च म ऋ॒द्धं च म ऋद्धिश्च मॆ क्लु॒प्तं च॑ मॆ॒ क्लुप्ति॑श्च मॆ म॒तिश्च॑ मॆ सुम॒तिश्च॑ मॆ ॥ 2 ॥

शं च॑ मॆ॒ मय॑श्च मॆ प्रि॒यं च॑ मॆ‌உनुका॒मश्च॑ मॆ॒ काम॑श्च मॆ सौमनस॒श्च॑ मॆ भ॒द्रं च॑ मॆ॒ श्रॆय॑श्च मॆ॒ वस्य॑श्च मॆ॒ यश॑श्च मॆ॒ भग॑श्च मॆ॒ द्रवि॑णं च मॆ य॒न्ता च॑ मॆ ध॒र्ता च॑ मॆ॒ क्षॆम॑श्च मॆ॒ धृति॑श्च मॆ॒ विश्वं॑ च मॆ॒ मह॑श्च मॆ स॒ंविच्च॑ मॆ॒ ज्ञात्रं॑ च मॆ॒ सूश्च॑ मॆ प्र॒सूश्च॑ मॆ॒ सीरं॑ च मॆ ल॒यश्च॑ म ऋ॒तं च॑ मॆ॒‌உमृतं॑ च मॆ‌உय॒क्ष्मं च॒ मॆ‌உना॑मयच्च मॆ जी॒वातु॑श्च मॆ दीर्घायु॒त्वं च॑ मॆ‌உनमि॒त्रं च॒ मॆ‌உभ॑यं च मॆ सु॒गं च॑ मॆ॒ शय॑नं च मॆ सू॒षा च॑ मॆ॒ सु॒दिनं॑ च मॆ ॥ 3 ॥

ऊर्क्च॑ मॆ सू॒नृता॑ च मॆ॒ पय॑श्च मॆ॒ रस॑श्च मॆ घृ॒तं च॑ मॆ॒ मधु॑ च मॆ॒ सग्धि॑श्च मॆ॒ सपी॑तिश्च मॆ कृ॒षिश्च॑ मॆ॒ वृष्टि॑श्च मॆ॒ जैत्रं॑ च म॒ औद्भि॑द्यं च मॆ र॒यिश्च॑ मॆ॒ राय॑श्च मॆ पु॒ष्टं च मॆ॒ पुष्टि॑श्च मॆ वि॒भु च॑ मॆ प्र॒भु च॑ मॆ ब॒हु च॑ मॆ॒ भूय॑श्च मॆ पू॒र्णं च॑ मॆ पू॒र्णत॑रं च॒ मॆ‌உक्षि॑तिश्च मॆ॒ कूय॑वाश्च॒ मॆ‌உन्नं॑ च॒ मॆ‌உक्षु॑च्च मॆ व्री॒हय॑श्च मॆ॒ यवा॓श्च मॆ॒ माषा॓श्च मॆ॒ तिला॓श्च मॆ मु॒द्गाश्च॑ मॆ ख॒ल्वा॓श्च मॆ गॊ॒धूमा॓श्च मॆ म॒सुरा॓श्च मॆ प्रि॒यङ्ग॑वश्च॒ मॆ‌உण॑वश्च मॆ श्या॒माका॓श्च मॆ नी॒वारा॓श्च मॆ ॥ 4 ॥

अश्मा च॑ मॆ॒ मृत्ति॑का च मॆ गि॒रय॑श्च मॆ॒ पर्व॑ताश्च मॆ॒ सिक॑ताश्च मॆ॒ वन॒स्-पत॑यश्च मॆ॒ हिर॑ण्यं च॒ मॆ‌உय॑श्च मॆ॒ सीसं॑ च॒ मॆ त्रपु॑श्च मॆ श्या॒मं च॑ मॆ लॊ॒हं च॑ मॆ‌உग्निश्च॑ म आप॑श्च मॆ वी॒रुध॑श्च म॒ ऒष॑धयश्च मॆ कृष्णप॒च्यं च॑ मॆ‌உकृष्णपच्यं च॑ मॆ ग्रा॒म्याश्च॑ मॆ प॒शव॑ आर॒ण्याश्च॑ य॒ज्ञॆन॑ कल्पन्तां वि॒त्तं च॑ मॆ॒ वित्ति॑श्च मॆ भू॒तं च॑ मॆ भूति॑श्च मॆ॒ वसु॑ च मॆ वस॒तिश्च॑ मॆ॒ कर्म॑ च मॆ॒ शक्ति॑श्च॒ मॆ‌உर्थ॑श्च म॒ ऎम॑श्च म इति॑श्च मॆ॒ गति॑श्च मॆ ॥ 5 ॥

अ॒ग्निश्च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ सॊम॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ सवि॒ता च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ सर॑स्वती च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ पू॒षा च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ बृह॒स्पति॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ मि॒त्रश्च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ वरु॑णश्च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ त्वष्ठा॑ च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ धा॒ता च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ विष्णु॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ‌உश्विनौ॑ च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ म॒रुत॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ विश्वॆ॑ च मॆ दॆ॒वा इन्द्र॑श्च मॆ पृथि॒वी च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ‌உन्तरि॑क्षं च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ द्यौश्च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ॒ दिश॑श्च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ मू॒र्धा च॑ म॒ इन्द्र॑श्च मॆ प्र॒जाप॑तिश्च म॒ इन्द्र॑श्च मॆ ॥ 6 ॥

अ॒ग्ं॒शुश्च॑ मॆ र॒श्मिश्च॒ मॆ‌உदा॓भ्यश्च॒ मॆ‌உधि॑पतिश्च म उपा॒ग्ं॒शुश्च॑ मॆ‌உन्तर्या॒मश्च॑ म ऐन्द्रवाय॒वश्च॑ मॆ मैत्रावरु॒णश्च॑ म आश्वि॒नश्च॑ मॆ प्रतिप्र॒स्थान॑श्च मॆ शु॒क्रश्च॑ मॆ म॒न्थी च॑ म आग्रय॒णश्च॑ मॆ वैश्वदॆ॒वश्च॑ मॆ ध्रु॒वश्च॑ मॆ वैश्वान॒रश्च॑ म ऋतुग्र॒हाश्च॑ मॆ‌உतिग्रा॒ह्या॓श्च म ऐन्द्रा॒ग्नश्च॑ मॆ वैश्वदॆ॒वश्च॑ मॆ मरुत्व॒तीया॓श्च मॆ माहॆ॒न्द्रश्च॑ म आदि॒त्यश्च॑ मॆ सावि॒त्रश्च॑ मॆ सारस्व॒तश्च॑ मॆ पौ॒ष्णश्च॑ मॆ पात्नीव॒तश्च॑ मॆ हारियॊज॒नश्च॑ मॆ ॥ 7 ॥

इ॒ध्मश्च॑ मॆ ब॒र्हिश्च॑ मॆ॒ वॆदि॑श्च मॆ॒ दिष्णि॑याश्च मॆ॒ स्रुच॑श्च मॆ चम॒साश्च॑ मॆ॒ ग्रावा॑णश्च मॆ॒ स्वर॑वश्च म उपर॒वाश्च॑ मॆ‌உधि॒षव॑णॆ च मॆ द्रॊणकल॒शश्च॑ मॆ वाय॒व्या॑नि च मॆ पूत॒भृच्च॑ म आधव॒नीय॑श्च म॒ आग्नी॓ध्रं च मॆ हवि॒र्धानं॑ च मॆ गृ॒हाश्च॑ मॆ॒ सद॑श्च मॆ पुरॊ॒डाशा॓श्च मॆ पच॒ताश्च॑ मॆ‌உवभृथश्च॑ मॆ स्वगाका॒रश्च॑ मॆ ॥ 8 ॥

अ॒ग्निश्च॑ मॆ घ॒र्मश्च॑ मॆ॒‌உर्कश्च॑ मॆ॒ सूर्य॑श्च मॆ प्रा॒णश्च॑ मॆ‌உश्वमॆ॒धश्च॑ मॆ पृथि॒वी च॒ मॆ‌உदि॑तिश्च मॆ॒ दिति॑श्च मॆ॒ द्यौश्च॑ मॆ॒ शक्व॑रीर॒ङ्गुल॑यॊ॒ दिश॑श्च मॆ य॒ज्ञॆन॑ कल्पन्ता॒मृक्च॑ मॆ॒ साम॑ च मॆ॒ स्तॊम॑श्च मॆ॒ यजु॑श्च मॆ दी॒क्षा च॑ मॆ॒ तप॑श्च म ऋ॒तुश्च॑ मॆ व्र॒तं च॑ मॆ‌உहॊरा॒त्रयॊ॓र्-दृ॒ष्ट्या बृ॑हद्रथन्त॒रॆ च॒ मॆ य॒ज्ञॆन॑ कल्पॆताम् ॥ 9 ॥

गर्भा॓श्च मॆ व॒त्साश्च॑ मॆ॒ त्र्यवि॑श्च मॆ त्र्य॒वीच॑ मॆ दित्य॒वाट् च॑ मॆ दित्यौ॒ही च॑ मॆ॒ पञ्चा॑विश्च मॆ पञ्चा॒वी च॑ मॆ त्रिव॒त्सश्च॑ मॆ त्रिव॒त्सा च॑ मॆ तुर्य॒वाट् च॑ मॆ तुर्यौ॒ही च॑ मॆ पष्ठ॒वाट् च॑ मॆ पष्ठौ॒ही च॑ म उ॒क्षा च॑ मॆ व॒शा च॑ म ऋष॒भश्च॑ मॆ वॆ॒हच्च॑ मॆ‌உन॒ड्वां च मॆ धॆ॒नुश्च॑ म॒ आयु॑र्-य॒ज्ञॆन॑ कल्पतां प्रा॒णॊ य॒ज्ञॆन॑ कल्पताम्-अपा॒नॊ य॒ज्ञॆन॑ कल्पतां॒ व्या॒नॊ य॒ज्ञॆन॑ कल्पतां॒ चक्षु॑र्-य॒ज्ञॆन॑ कल्पता॒ग्॒ श्रॊत्रं॑ य॒ज्ञॆन॑ कल्पतां॒ मनॊ॑ य॒ज्ञॆन॑ कल्पतां॒ वाग्-य॒ज्ञॆन॑ कल्पताम्-आ॒त्मा य॒ज्ञॆन॑ कल्पतां य॒ज्ञॊ य॒ज्ञॆन॑ कल्पताम् ॥ 10 ॥

ऎका॑ च मॆ ति॒स्रश्च॑ मॆ॒ पञ्च॑ च मॆ स॒प्त च॑ मॆ॒ नव॑ च म॒ ऎका॑दश च मॆ॒ त्रयॊ॒दश च मॆ॒ पञ्च॑दश च मॆ स॒प्तद॑श च मॆ॒ नव॑दश च म॒ ऎक॑विग्ंशतिश्च मॆ॒ त्रयॊ॑विग्ंशतिश्च मॆ॒ पञ्च॑विग्ंशतिश्च मॆ स॒प्त विग्ं॑शतिश्च मॆ॒ नव॑विग्ंशतिश्च म॒ ऎक॑त्रिग्ंशच्च मॆ॒ त्रय॑स्त्रिग्ंशच्च मॆ॒ चत॑स्-रश्च मॆ॒‌உष्टौ च॑ मॆ॒ द्वाद॑श च मॆ॒ षॊड॑श च मॆ विग्ंश॒तिश्च॑ मॆ॒ चतु॑र्विग्ंशतिश्च मॆ॒‌உष्टाविग्ं॑शतिश्च मॆ॒ द्वात्रिग्ं॑शच्च मॆ॒ षट्-त्रिग्ं॑शच्च मॆ चत्वारि॒ग्॒ंशच्च॑ मॆ॒ चतु॑श्-चत्वारिग्ंशच्च मॆ‌உष्टाच॑त्वारिग्ंशच्च मॆ॒ वाज॑श्च प्रस॒वश्चा॑पि॒जश्च क्रतु॑श्च॒ सुव॑श्च मू॒र्धा च॒ व्यश्नि॑यश्-चान्त्याय॒नश्-चान्त्य॑श्च भौव॒नश्च॒ भुव॑न॒श्-चाधि॑पतिश्च ॥ 11 ॥

ॐ इडा॑ दॆव॒हूर्-मनु॑र्-यज्ञ॒नीर्-बृह॒स्पति॑रुक्थाम॒दानि॑ शग्ंसिष॒द्-विश्वॆ॑-दॆ॒वाः सू॓क्त॒वाचः॒ पृथि॑विमात॒र्मा मा॑ हिग्ंसी॒र्-म॒धु॑ मनिष्यॆ॒ मधु॑ जनिष्यॆ॒ मधु॑ वक्ष्यामि॒ मधु॑ वदिष्यामि॒ मधु॑मतीं दॆ॒वॆभ्यॊ॒ वाच॒मुद्यासग्ंशुश्रूषॆ॒ण्या॓म् मनु॒ष्यॆ॓भ्य॒स्तं मा॑ दॆ॒वा अ॑वन्तु शॊ॒भायै॑ पि॒तरॊ‌உनु॑मदन्तु ॥

ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥

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