Archive for March, 2010

दुर्गा आरती (Durga Aarthi)

Wednesday, March 31st, 2010

दुर्गा माँ आरती

 

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥

 

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्जवल से दो‌उ नैना, चन्द्रबदन नीको ॥ जय अम्बे गौरी ॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै । रक्त पुष्प गलमाला, कण्ठन पर साजै ॥ जय अम्बे गौरी ॥

केहरि वाहन राजत, खड़ग खप्परधारी । सुर नर मुनिजन सेवक, तिनके दुखहारी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ॥ जय अम्बे गौरी ॥

शुम्भ निशुम्भ विडारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ जय अम्बे गौरी ॥

चण्ड मुण्ड संघारे, शोणित बीज हरे । मधुकैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे ॥ जय अम्बे गौरी ॥

ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

चौसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरुं । बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु ॥ जय अम्बे गौरी ॥

तुम हो जग की माता, तुम ही हो भर्ता । भक्‍तन् की दुःख हरता, सुख-सम्पत्ति करता ॥ जय अम्बे गौरी ॥

भुजा चार अति शोभित, खड़ग खप्परधारी । मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ जय अम्बे गौरी ॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ॥ जय अम्बे गौरी ॥

श्री अम्बे जी की आरती, जो को‌ई नर गावै ।

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै ॥ जय अम्बे गौरी ॥

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श्री दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa)

Wednesday, March 31st, 2010

श्री दुर्गा चालीसा

 

नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥

निराकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूं लोक फैली उजियारी ॥

शशि ललाट मुख महा विशाला । नेत्र लाल भृकुटी विकराला ॥

रुप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा हु‌ई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

रुप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा ॥

धरा रुप नरसिंह को अम्बा । प्रगट भ‌ई फाड़कर खम्बा ॥

रक्षा कर प्रहलाद बचायो । हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रुप धरो जग माही । श्री नारायण अंग समाही ॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा । दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणि । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥

केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर खड्ग विराजे । जाको देख काल डर भाजे ॥

सोहे अस्त्र और तिरशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगर कोटि में तुम्ही विराजत । तिहूं लोक में डंका बाजत ॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रुप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भ‌ई सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब रहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावै । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन ला‌ई । जन्म-मरण ताको छुटि जा‌ई ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रुप को मरम न पायो । शक्ति ग‌ई तब मन पछतायो ॥

शरणागत हु‌ई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

भ‌ई प्रसन्न आदि जगदम्बा । द‌ई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतवे । मोह मदादिक सब विनशावै ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरों इकचित तुम्हें भवानी ॥

करौ कृपा हे मातु दयाला । ऋद्घि सिद्घि दे करहु निहाला ॥

जब लगि जियौं दया फल पा‌ऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुना‌ऊँ ॥

दुर्गा चालीसा जो नित गावै । सब सुख भोग परम पद पावै ॥

देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

॥ जय माता दी ॥

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देवी अर्गलास्तोत्रम् (Durga Argala Stotram)

Wednesday, March 31st, 2010

अथ अर्गलास्तोत्रम् 
ॐ नमश्वण्डिकायै  -  मार्कण्डेय उवाच ।

 
ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ २॥

मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३॥

महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥

धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५॥

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६॥

निशुम्भशुम्भनिर्नाशि त्रिलोक्यशुभदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ७॥

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ८॥

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ९॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चापर्णे दुरितापहे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १०॥

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ११॥

चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १२॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३॥

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १४॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५॥

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७॥

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पनिषूदिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १८॥

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १९॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंसुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २०॥

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१॥

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२॥

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २३॥

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २४॥

भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २५॥

तारिणि दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २६॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः । सप्तशतीं समाराध्य वरमाप्नोति दुर्लभम् ॥ २७॥

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥

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दुर्गा बत्तीसनामावली – Durga 32 Namavali

Wednesday, March 31st, 2010

32 Names of Durga   -  दुर्गा बत्तीसनामावली 

१) दुर्गा २) दुर्गार्तिशमनी ३) दुर्गापद्विनिवारिणी ४) दुर्गमच्छेदिनी ५) दुर्गसाधिनि

६) दुर्गनाशिनी ७) दुर्गतोद्धारिणी ८) दुर्गनिहन्त्रि ९) दुर्गमापहा १०) दुर्गमज्ञानदा

११) दुर्गदैत्यलोकदवानला १२) दुर्गमा १३) दुर्गमालोका १४) दुर्गमात्मस्वरुपिणी १५) दुर्गमार्गप्रदा

१६) दुर्गमविद्या १७) दुर्गमाश्रिता १८) दुर्गमज्ञानसंस्थाना १९) दुर्गमध्यानभासिना २०) दुर्गमोहा

२१) दुर्गमगा २२) दुर्गमार्थस्वरुपिणी २३) दुर्गमासुरसंहन्त्री २४) दुर्गमायुधधारिणी २५) दुर्गमाड्गी

२७) दुर्गमता  २७) दुर्गम्या २८) दुर्गमेश्‍वरी २९) दुर्गभीमा ३०) दुर्गभामी ३१) दुर्गभा ३२) दुर्गदारिणी

जय  माता दी    -  Jai Matha Di

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श्री रामचन्द्रा – Sri RamaChandra

Wednesday, March 24th, 2010

Sri Rama Rama Rameti Rame Rame Manorame

Sahasra Nama Tattulyam Rama Nama Varanane

श्री राम राम रामेति रमे रामे मनोरमे

सहस्र नामा तत्तुल्यं राम नामा वरानने

Sri Raghavam Dasaradhatmajama MaPrameyam
Seehapatim Raghuvarnvayaratna deeepam
Aajanubhahum Aravidha Dhallayataatkshayam
Ramam nisacharavinasakaram Navami

अगस्त्यसंहिताके अनुसार चैत्र शुक्ल नवमीके दिन पुनर्वसु नक्षत्र, कर्कलग्‍नमें जब सूर्य अन्यान्य पाँच ग्रहोंकी शुभ दृष्टिके साथ मेषराशिपर विराजमान थे, तभी साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीरामका माता कौसल्याके गर्भसे जन्म हुआ।

चैत्र शुक्ल नवमी का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। आज ही के दिन तेत्रा युग में रघुकुल शिरोमणि महाराज दशरथ एवं महारानी कौशल्या के यहाँ अखिल ब्रम्हांड नायक अखिलेश ने पुत्र के रूप में जन्म लिया था। दिन के बारह बजे जैसे ही सौंदर्य निकेतन, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कि‌ए हु‌ए चतुर्भुजधारी श्रीराम प्रकट हु‌ए तो मानो माता कौशल्या उन्हें देखकर विस्मित हो ग‌ईं।

उनके सौंदर्य व तेज को देखकर उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे। श्रीराम के जन्मोत्सव को देखकर देवलोक भी अवध के सामने फीका लग रहा था। देवता, ऋषि, किन्नार, चारण सभी जन्मोत्सव में शामिल होकर आनंद उठा रहे थे। आज भी हम प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को राम जन्मोत्सव मनाते हैं और राममय होकर कीर्तन, भजन, कथा आदि में रम जाते हैं।

रामजन्म के कारण ही चैत्र शुक्ल नवमी को रामनवमी कहा जाता है। रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना का श्रीगणेश किया था। उस दिन जो कोई व्यक्ति दिनभर उपवास और रातभर जागरणका व्रत रखकर भगवान्‌ श्रीरामकी पूजा करता है, तथा अपनी आर्थिक स्थितिके अनुसार दान-पुण्य करता है, वह अनेक जन्मोंके पापोंको भस्म करनेमें समर्थ होता है।

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लिंगाष्टकम (Lingashtakam)

Saturday, March 20th, 2010

लिंगाष्टकम – Sri Shiva Lingashtakam

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिङ्गं
निर्मलभासित शॊभित लिङ्गम् ।
जन्मज दुःख विनाशक लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 1 ॥

दॆवमुनि प्रवरार्चित लिङ्गं
कामदहन करुणाकर लिङ्गम् ।
रावण दर्प विनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 2 ॥

सर्व सुगन्ध सुलॆपित लिङ्गं
बुद्धि विवर्धन कारण लिङ्गम् ।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 3 ॥

कनक महामणि भूषित लिङ्गं
फणिपति वॆष्टित शॊभित लिङ्गम् ।
दक्ष सुयज्ञ निनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 4 ॥

कुङ्कुम चन्दन लॆपित लिङ्गं
पङ्कज हार सुशॊभित लिङ्गम् ।
सञ्चित पाप विनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 5 ॥

दॆवगणार्चित सॆवित लिङ्गं
भावै-र्भक्तिभिरॆव च लिङ्गम् ।
दिनकर कॊटि प्रभाकर लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 6 ॥

अष्टदलॊपरिवॆष्टित लिङ्गं
सर्वसमुद्भव कारण लिङ्गम् ।
अष्टदरिद्र विनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 7 ॥

सुरगुरु सुरवर पूजित लिङ्गं
सुरवन पुष्प सदार्चित लिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मक लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 8 ॥

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठॆश्शिव सन्निधौ ।
शिवलॊकमवाप्नॊति शिवॆन सह मॊदतॆ ॥

OR

लिंगाष्टकम – Shiva Stuthi

Meaning of Lingashtakam

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is honored by Brahma, Murari and Indra, Which is adorned and resplendent by clear light, and Which destroys the grief born out of the birth.||1||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is honored by demi-gods and the best sages, Which destroys the fear of Kamadeva or desires, Which is the abode of compassion, and Which destroyed the pride of the demon Ravana.||2||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is applied and covered by a fragrant paste, Which is the reason for the increment of wisdom in persons, and Which has been extolled by siddha, demi-gods and demons alike.||3||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is adorned with gold and grand precious jewels, Which is surrounded and adorned by a garland of the king of snakes (Naga), and Which destroyed the grand sacrifice of Daksa Prajapati in the old times.||4||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is applied by a paste of sandalwood and kumkuma, Which is adorned by a garland of lotuses, and Which destroys the accumulated sins of living beings.||5||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is honoured by demi-gods and the Gana of Siva, possessed with devotional emotions, and Which is resplendent with light like millions of sun.||6||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is surrounded by flowers having eight-petals, Which is the reason behind the birth of everything, and Which destroys the eight types of poverty.||7||

I continuously bow to that Linga of Siva, Which is revered by demi-gods, preceptors and Indra, Which is offered wild-flowers, from forests, by the demi-gods, Which is beyond everything, and Which is like the Paramatman.||8||

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श्री कनकधारास्तोत्रम् (Sri Kankadhara Stotram)

Wednesday, March 10th, 2010

Sri Adi Sankara Kankadhara Stotram ( Hindi Version)

श्री कनकधारास्तोत्रम्

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती

भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।

अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला

माङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥ १॥

The dark Tamala tree in full bloom attracts the femalebeetle and even so Mahalakshmi is attracted and finds happiness in the fragrant and dark-complexioned body of Hari and makes it tingle with joy. May she bestow on me prosperity by her auspicious glance. Note: The poet in Shankara compares the dark Tamala tree to the dark beautiful form of Vishnu, the dark beetle to the black lustrous eyes of Mahalakshmi. The glance of Lakshmi’s eyes on Vishnu gives him great happiness. A mere momentary flash of her eyes on anybody will bless him with prosperity || 1 ||

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः

प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।

माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या

सा मे श्रियं दिशतु सागरसंभवायाः ॥ २॥

The shy love-laden sidelong glance of the beauteous dark eyes of the daughter oof the Milky Ocean, returns again and again to the beauteous lotus face of Murari,  just like the black bee constantly returning and flitting about the beautiful blue lotus flower. I pray that these glances be bestowed upon me to bless me with prosperity.  || 2 || 

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दं

आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।

आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं

भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥ ३॥

The eyes of Mukunda remain closed in ecstasy. The beauteous dark eyes of Lakshmi remain fixed on Mukunda in love and wonder and remain open without blinking| May these eyes of Mahalakshmi fall on me and bless me with prosperity and happiness || 3 ||

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या

हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।

कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला

कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ४॥

Lord Vishnu whose chest is adorned by the Kaustubha Mala is also adorned by the series of the beauteous glances of Goddess Mahalakshmi. This string of glances resembles a necklace of precious blue stones of Indraneela and they are capable of fulfilling all the wishes of Hari Himself. May this string of glances be directed towards me so that it will bring me auspiciousness.|| 4 ||

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेः

धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।

मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिः

भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥ ५॥

Mahalakshmi shining on the dark broad chest of Mahavishnu is like the streak of lightning illuminating the dark rain clouds. May she, the daughter of the Sage Bhargava worshipped as Mother by the entire universe, bring me auspiciousness|| 5 ||

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्

माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।

मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं

मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ६॥

The God of Love, Manmatha, could gain access to Madhusudana (the destroyer of the demon Madhu, i.e. Vishnu) only because he was favored with the blessing  glance from Mahalakshmi. May her auspicious indolent sideglance fall on me (May she bless me with prosperity by looking at me in passing at least for a moment || 6 ||

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षं

आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।

ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्

इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ७॥

The status of the king of kings or the exal;ted position of an Indra are given effortlessly by Mahalakshmi by a mere momentary glance. Murari (Vishnu) who is supreme bliss itself is made happy by it. May this glance from the blue-lotus eyes of Lakshmi fall on me for a moment at least. Note: The beautepus lotus eyes flashing momentarily on someone is capable of making him a king of kings ir even an Indra. Murari the seat of all bliss is thrown into ecstasy by it. Will she not glance at me , even for a second? || 7||

इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-

दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।

दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां

पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ८॥

The higher worlds like Swarga which are difficult of attainment and for which great sacrifices like Ashwamedha are performed become easily attainable by the compassion filled look of the lotus eyes of Mahalakshmi. May she look at me so that I may attain my heart’s desires. || 8 ||

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां

अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।

दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं

नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ९॥

The dark rain clouds driven by the monsoon winds releases rain on the parched earth and quench the thirst of the Chataka bird and brings prosperity on the earth. In like manner may the dark eyes of Mahalakshmi resembling the rain cloud wafted by the breeze of compassion relese the rain of prosperity on this devotee of a Chataka bird stricken with the load of accumulated sins so that the sins are washed away and prosperity bestowed upon him. || 9 ||

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति

शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।

सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै

तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १०॥

We offer obeisance to the Goddess Mahalakshmi, the consort of Narayana, the preceptor of all the three worlds. She is variously known as Saraswati the Goddess of Learning, as Goddess Lakshmi, the Divine consort of Mahavishnu, as Shakambhari or as Parvati the consort of Lord Maheshwara. Verily it is she who is playfully engaged in creation, protaction and final destruction of the Universe || 10 ||

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै

रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।

शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै

पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११॥

O Goddess as the very manifestation of the Vedas, you grant the fruits of godd action. Beautiful in form like Rati Devi you are the very ocean of superlatively beautiful qualities. Having your abode in the beautiful lotus of a hundred petals, you are Shakti personified. O consort of Purushottama, You are the Goddess of plenty. Please accept my obeisance || 11 ||

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै

नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।

नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै

नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२॥

O Consort of Narayana! Whose face is as beautiful as the lotus in bloom, I bow down to thee. Born out of the milky ocean, along with the moon and the Divine nectar, O Goddess! accept my pranams|| 12 ||

नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै

नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै ।

नमोऽस्तु देवादिदयापरायै

नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १३॥

I prostrate before you, O Goddess, who are seated on the Golden Lotus, who is Goddess of the earth, the consort of Narayana, compassionate to the Devas|| 13 ||

नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै

नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै ।

नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै

नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ १४॥

My obeisance to you, O daughter of Bhrigu, consort of Damadara| O Lakshmi, seated on Lotus and adorning the broad chest of Mahavishnu, my salutations to Thee|| 14 ||

नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै

नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।

नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै

नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ १५॥

O Consort of Gopala, the son of Nanda, you are worshipped by the Devas. You are Jyoti incarnate, I prostrate before Thee. Your eyes are like lotus petals. You have created the world and you bestow prosperity. Please accept my salutations || 15 ||

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि

साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।

त्वद्वन्दनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि

मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥ १६॥

May I always have the desire to prostrate before you because a pranam to you is capable of bestowing all prosperity and will bring happiness to all the senses. Worshipping O Lotus-eyed Goddess not only removes all miseries but it confers happiness and plenty || 16 ||

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः

सेवकस्य सकलार्थसंपदः ।

संतनोति वचनाङ्गमानसैः

त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १७॥

The devotee who worships your Kataksha (sidelong glance) is blessed with wealth and prosperity. To you, the queen who dominates the heart of Vishnu, my pranamas, through word, thought, and deed|| 17 ||

सरसिजनिलये सरोजहस्ते

धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।

भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे

त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १८॥

Seated on the lotus with the lotus flower in your hand, dresed in dazzling white and adorned with garlands andsandalwood paste, you gladden our hearts. O Goddess, the consort of Vishnu you who confer prosperity on all the three worlds, please show compassion towards me|| 18 ||

दिग् हस्तिभिः कनककुंभमुखावसृष्ट-

स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।

प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-

लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १९॥

O mother of all the worlds, consort of Vishnu the lord of the Universe, the Dig-gajas (the celestial elephants guarding various directions) bathe you everyday with waters of the Deva Ganga poured ouitfrom golden vessels. O daughter of the milky ocean, I prostrate before Thee || 19 ||

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं

करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।

अवलोकय मामकिञ्चनानां

प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ २०॥

O Goddess Lakshmi, consort of the Lotus-eyed Mahavishnu, direct your gaze filled with compassion at me, your devotee who am the poorest of the poor, so that I may become the true recipient of the benefits of your compassion|| 20 ||

देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातः

कल्याणगात्रि कमलेक्षणजीवनाथे ।

दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं माम्

आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः ॥ २१॥

O Goddess, controller of the Universe and protector of the people, blessing with your limbs, and gazing with your lotus-like eyes, forgive me. With my heart filled with fear of poverty, I surrender myself wholly to you, that you may watch over me every day with unbroken compassion || 21 ||

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं

त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।

गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो

भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ २२॥

Those who sing the praise of Mahalakshmi who is the vedas personified, by these stotras everyday will be blessed with all good qualities, unsurpassed good fortune and powers of the intellect which will earn praise from even the learned. || 22 ||

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत  

श्री कनकधारास्तोत्रं संपूर्णम् ॥

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गोविंद दामोदर स्तोत्र (Govinda Damodar Stotram)

Tuesday, March 9th, 2010
  

गोविंद दामोदर स्तोत्र

 

अग्रे कुरूनाम् अथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृत वस्त्रकेशा ।
कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथ गोविंद दामोदर माधवेति ॥

जिस समय कौरव और पाण्डवोंके सामने भरी सभामें दुःशासनने द्रौपदीके वस्त्र और बालोंको पकडकर खींचा, उस समय जिसका कोई दूसरा नाथ नहीं ऐसी द्रौपदीने रोकर पुकारा – ‘ हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ ॥१॥

श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।
त्रायस्व माम् केशव लोकनाथ गोविंद दामोदर माधवेति ॥

‘हे श्रीकृष्ण ! हे विष्णो ! हे मधुकैटभको मारनेवाले ! हे भक्तोंके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले ! हे भगवन्‌ ! हे मुरारे ! हे केशव ! हे लोकेश्वर ! हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो’ ॥२॥

विक्रेतुकाम अखिल गोपकन्या मुरारी पदार्पित चित्तवृत्त्यः ।
दध्योदकं मोहवसादवोचद् गोविंद दामोदर माधवेति ॥

जिनकी चित्तवृत्ति मुरारिके चरणकमलोंमे लगी हुई है, वे सभी गोपकन्याएँ दूध-दही बेचनेकी इच्छासे घरसे चलीं । उनका मन तो मुरारिके पास था; अतः प्रेमवश सुध-बुध भूल जानेके कारण ‘दही लो दही’ इसके स्थानपर जोर-जोरसे ‘गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! आदि पुकारने लगीं ॥३॥

जगधोय दत्तो नवनीत पिण्डः गृहे यशोदा विचिकित्सयानि ।
उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविंद दामोदर माधवेति ॥

जिह्वे रसाग्रे मधुरा प्रिया त्वं सत्यं हितं त्वं परमं वदामि ।
अवर्णयेत मधुराक्षराणि गोविंद दामोदर माधवेति ॥

गोविंद गोविंद हरे मुरारे गोविंद गोविंद मुकुंद कृष्ण ।
गोविंद गोविंद रथांगपाणे गोविंद दामोदर माधवेति ॥

सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम् ।
देहावसाने त्विदमेव जप्यं गोविंद दामोदर माधवेति ॥

सुखके अन्तमें यही सार है, दुःखके अन्तमें यही गाने योग्य है और शरीरका अन्त होनेके समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन-सा मन्त्र ? यही कि ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ ॥

वक्तुं समर्थोपि नवक्ति कश्चित् अहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् ।
जिह्वे पिबस्वमृतमेतदेव गोविंद दामोदर माधवेति ॥

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श्री कृष्ण स्तुती (Sri Krishna Stuthi)

Tuesday, March 9th, 2010

 श्री कृष्ण स्तुती

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले,
वक्षस्थले कौस्तुभम ।

नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले,
वेणु करे कंकणम ।

सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम,
कंठे च मुक्तावलि ।

गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते,
गोपाल चूडामणी ॥

Shri Krishna Sthuti

KASTURI TILAKAM LALAT PATALE,

VAKSHAH STHALE KAUSTUBHAM;

NASAGRE VARMAUKTIKAM KARATALE

VENU KARE KANKANAM

SARVANGE HARI CHANDANAM SULALITAM

KANTHE CHA MUKTAVALI

GOPASTREE PARVESHTITO VIJAYATE

GOPALA CHOODAMANI

Meaning : “Oh Shri Krishna ! You have been decorated with Kasturi Tilakam, a beautiful Namam on the smooth forehead; You have an ornament of Kausthubham on your Vakshasthalam, the seat of Sri Maha Lakshmi (on the chest); On the nose, You have nava mouktikam, another ornament;On your fingertips, You have a Flute; You also have a Bracelet on Your wrist; Your entire body is bedecked with sandawood paste giving out fragrance; Your neck too is surrounded by another ornament; You are the giver of Mukti (salvation) to the lady-cowherds who went rounds and rounds around You; Oh that Lord, Victory to You -The Ornament to the ornaments of cowherd.

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