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PostHeaderIcon श्री गणेश चतुर्थी पूजा विधि – व्रत कथा

श्री विनायक चतुर्थी पूजा - कथा- Sri Ganesh Chaturthi Puja Process and Katha

 

भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन सिद्धि विनायक व्रत किया जाता है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार वर्ष 2011, में यह व्रत 1 सितम्बर, गुरुवार के दिन किया जायेगा. इस व्रत के फल इस व्रत के अनुसार प्राप्त होते है. भगवान श्री गणेश को जीवन की विध्न-बाधाएं हटाने वाला कहा गया है. और श्री गणेश सभी कि मनोकामनाएं पूरी करते है. गणेशजी को सभी देवों में सबसे अधिक महत्व दिया गया है. कोई भी नया कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व भगवान श्री गणेश को याद किया जाता है. 

विनायक चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश का जन्म उत्सव का दिन है.  यह दिन गणेशोत्सव के रुप में सारे विश्व में बडे हि हर्ष व श्रद्वा के साथ मनाया जाता है. भारत में इसकी धूम यूं तो सभी प्रदेशों में होती है. परन्तु विशेष रुप से यह महाराष्ट में किया जाता है. इस उत्सव को महाराष्ट का मुख्य पर्व भी कहा जा सकता है. लोग मौहल्लों, चौराहों पर गणेशजी की स्थापना करते है. आरती और भगवान श्री गणेश के जयकारों से सारा माहौळ गुंज रहा होता है. इस उत्सव का अंत अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गणेश की मूर्ति समुद्र में विसर्जित करने के बाद होता है.  

श्री गणेश पूजा विधि

1. दीप प्रज्ज्वलन एवं पूजन

2. आचमन

3.पवित्रकरण (मार्जन)

4. आसन पूजा

5. स्वस्तिवाचन

6. संकल्प

Sankalp संकल्प : (दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले

‘ऊँ विष्णु र्विष्णुर्विष्णु : श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे —— नगरे —— ग्रामे वा बौद्धावतारे विजय नाम संवत्सरे श्री सूर्ये दक्षिणायने वर्षा ऋतौ महामाँगल्यप्रद मासोत्तमे शुभ भाद्रप्रद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थ्याम्‌ तिथौ भृगुवासरे हस्त नक्षत्रे शुभ योगे गर करणे तुला राशि स्थिते चन्द्रे सिंह राशि स्थिते सूर्य वृष राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायाँ चतुर्थ्याम्‌ शुभ पुण्य तिथौ —- गौत्रः —- अमुक शर्मा दासो ऽहं मम आत्मनः श्रीमन्‌ महागणपति प्रीत्यर्थम्‌ यथालब्धोपचारैस्तदीयं पूजनं करिष्ये।”

इसके पश्चात्‌ हाथ का जल किसी पात्र में छोड़ देवें।

7. श्री गणेश ध्यान 

8. आवाहन व प्रतिष्ठापन

Ganpati Aawahanam आवाहन

नागास्यम्‌ नागहारम्‌ त्वाम्‌ गणराजम्‌ चतुर्भुजम्‌। भूषितम्‌ स्व-आयुधै-है पाश-अंकुश परश्वधैहै॥

आवाह-यामि पूजार्थम्‌ रक्षार्थम्‌ च मम क्रतोहो। इह आगत्व गृहाण त्वम्‌ पूजा यागम्‌ च रक्ष मे॥

ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धिसहिताय गण-पतये नमह, गणपतिम्‌-आवाह-यामि स्थाप-यामि। (गंधाक्षत अर्पित करें।)

Pratisthhapan प्रतिष्ठापन

आवाहन के पश्चात देवता का प्रतिष्ठापन करें-

अस्यै प्राणाहा प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाह क्षरन्तु च। अस्यै देव-त्वम्‌-अर्चायै माम-हेति च कश्चन॥ ॐ भू-हू भुवह स्वह सिद्धि-बुद्धि-सहित-गणपते सु-प्रतिष्ठितो वरदो भव।

9. स्नान

10. वस्त्र एवं उपवस्त्र

11. गंध व सिन्दूर

12. पुष्प एवं पुष्पमाला

13. दूर्वा

14. धूप

15. दीप

16. नैवेद्य

17. दक्षिणा एवं श्रीफल

18. पुष्पों के सात श्री गणेश पूजा किजि ये – Offer Flowers to lord ganesha

विनायक अश्तोत्ताराम्स 108 names of ganesha

श्री गणेश स्तुती , गणेशा अश्तोत्तारा सथानमा स्तोत्रं , श्री गणेशा पंचारातना स्तोत्रं

18. आरती

19. पुष्पाँजलि

Pushpanjali Mantra पुष्पाञ्जलि समर्पण

ॐ भूहू-भुवह सिद्धि-बुद्धि-सहिताय महा-गणपतये नमह्‌, मन्त्र-पुष्प-अंजलि समर्पयामि।

20. प्रदक्षिणा

21. प्रार्थना एवं क्षमा प्रार्थना

Pradikshna and Kshama Prarthana प्रदक्षिणा व क्षमाप्रार्थना

 

यानि कानि च पापानि ज्ञात-अज्ञात-कृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिण-पदे पदे॥

आवाहनम्‌ न जानामि न जानामि तवार्चनाम्‌ । यत्‌-पूजितम्‌ मया देव परि-पूर्णम्‌ तदस्तु मे ॥

अपराध सहस्त्राणि-क्रियंते अहर्नीशं मया । तत्‌सर्वम्‌ क्षम्यताम्‌ देव प्रसीद परमेश्वर ॥

22. प्रणाम एवं पूजा समर्पण।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा – Ganesh Chaturthi Vrat Story

श्री गणेश चतुर्थी व्रत को लेकर एक पौराणिक कथा प्रचलन में है. कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थें. वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिये चौपड खेलने को कहा. भगवान शंकर चौपड खेलने के लिये तो तैयार हो गये. परन्तु इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा?

इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी. और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते है. परन्तु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिये तुम बताना की हम मे से कौन हारा और कौन जीता.

यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया. खेल तीन बार खेला गया, और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई. खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिये कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई. और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने व किचड में पडे रहने का श्राप दे दिया. बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऎसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऎसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिये नाग कन्याएं आयेंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऎसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगें, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई.

ठिक एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं. नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालुम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया. उसकी श्रद्वा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए. और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिये कहा. बालक ने कहा की है विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों.

बालक को यह वरदान दे, श्री गणेश अन्तर्धान हो गए. बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. और अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. उस दिन से पार्वती जी शिवजी से विमुख हो गई. देवी के रुष्ठ होने पर भगवान शंकर ने भी बालक के बताये अनुसार श्री गणेश का व्रत 21 दिनों तक किया. इसके प्रभाव से माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी. वह समाप्त होई.

यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई. यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई. माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया. व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें. उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है.   

विनायक चतुर्थी व्रत विधि (Vinayak Chaturthi Fast Method)

श्री गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन हुआ था. इसलिये इनके जन्म दिवस को व्रत कर श्री गणेश जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है. जिस वर्ष में यह व्रत रविवार और मंगलवार के दिन का होता है. उस वर्ष में इस व्रत को महाचतुर्थी व्रत कहा जाता है.   

इस व्रत को करने की विधि भी श्री गणेश के अन्य व्रतों के समान ही सरल है. गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास में कृ्ष्णपक्ष की चतुर्थी में किया जाता है,. पर इस व्रत की यह विशेषता है, कि यह व्रत सिद्धि विनायक श्री गणेश के जन्म दिवस के दिन किया जाता है. सभी 12 चतुर्थियों में माघ, श्रावण, भाद्रपद और मार्गशीर्ष माह में पडने वाली चतुर्थी का व्रत करन विशेष कल्याणकारी रहता है. 

व्रत के दिन उपवासक को प्रात:काल में जल्द उठना चाहिए. सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नान और अन्य नित्यकर्म कर, सारे घर को गंगाजल से शुद्ध कर लेना चाहिए. स्नान करने के लिये भी अगर सफेद तिलों के घोल को जल में मिलाकर स्नान किया जाता है. तो शुभ रहता है. प्रात: श्री गणेश की पूजा करने के बाद, दोपहर में गणेश के बीजमंत्र ऊँ गं गणपतये नम: का जाप करना चाहिए.

इसके पश्चात भगवान श्री गणेश  धूप, दूर्वा, दीप, पुष्प, नैवेद्ध व जल आदि से पूजन करना चाहिए. और भगवान श्री गणेश को लाल वस्त्र धारण कराने चाहिए. अगर यह संभव न हों, तो लाल वस्त्र का दान करना चाहिए.

पूजा में घी से बने 21 लड्डूओं से पूजा करनी चाहिए. इसमें से दस अपने पास रख कर, शेष सामग्री और गणेश मूर्ति किसी ब्राह्मण को दान-दक्षिणा सहित दान कर देनी चाहिए. 

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श्री गणेश संकट चौथ व्रत – Shri Ganesh Sankat Chouth Vrat

गणेश चतुर्थी का व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है | इस दिन विधा – बुद्धि – वारिधि के सवामी गणेश तथा चंद्रमा की पूजा की जाती है |

Sankasti Chaturthi is celebrated on 4th day of krishna paksha every month. People observe fast the whole day to get rid of their problems in life.

माता पार्वती ने भी भगवान शंकर के कहने पर माघ कृष्ण चतुर्थी को संकष्ट हरण श्री गणेश जी का व्रत रखा था | फलस्वरूप उन्हें गणेश जी पुत्रस्वरूप में प्राप्त हुए| भगवान शंकर के मस्तक पर सुशोभित होने वाला चंद्रमा आज के दिन श्री गणेश भगवान के मस्तक पर विराजमान होता है| इसलिए आज चंद्रा दर्शन का अर्थ है श्री गणेश भगवान के दर्शन होना|

माघ कृ्ष्ण पक्ष (संकट चौथ) – Sat, 22 Jan 2011
माघ शुक्ल पक्ष (तिल चौथ) – Sun, 6 Feb 2011

On this day, one should observe a complete fast the whole day. In the evening after a bath, one should make preparations for the ritualistic worship of Lord Ganesh. In the night after looking at the moon, either an idol of Ganesh or a betelnut placed on a mound of consecrated rice (akshata) symbolic of Ganesh, should be worshipped with sixteen substances (shodashopchar puja). Twenty-one rounds (avartans) of the Atharvashirsha should be recited. One should pay obeisance to the moon after giving an offering and sprinkling sandalwood paste (gandha), flowers and consecrated rice in its direction.

माघ मास में ‘भालचन्द्र’ नामक गणेश की पूजा करनी चाहिए | इनका पूजन षोडशोउपचार विधि से करना चाहिए | तिल के दस लड्डू बनाकर, पांच लड्डू देवता को चढ़ावे और शेष पांच ब्रह्मण को दान दे देवें | मोदक तथा गुड मे बने तिल (सफेद) के लड्डू और मगदल का नैवेद्या अर्पित करें- चावल के लड्डू भी चढ़ाएं | चंद्र दर्शन करें और चंद्रमा को भी अर्घ्या प्रदान करें| क्योंकि इस दिन भगवान गणेश चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करतें हैं|  माघ कृष्ण – गणेश चतुर्थी व्रत कथा ( ऋषि शर्मा ब्राह्मण की कथा ) पढ़े या सुने |

Ganesh Sankashti Chaturthi Mantra Stuti

गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्दिप्रदायकम.
संकष्ठ हरणं मे देव गृहानार्घः नमोस्तुते -
कृष्ण पक्षे चतुर्थ याँ तू सम्पुजितिम विधुदये.
क्षिप्रं प्रसीद देवेश गृहानार्घः नमोस्तुते -

Chaturthi Tithi Mantra

तिथिनामुत्तमे देवी गणेश प्रियेवाल्लभे-
सर्वसंकट नाशाय गृहण अर्घ्य नमोस्तुते .
“चतुर्थ येई नमः ” इदम् अर्घ समर्पयामि

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श्री गणेश स्तुती  – श्री गणेश मन्त्र  – Sri Ganesha Mantra Stuti

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजंबूफलचारुभक्षणम्‌ ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्‌ ॥
सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र ।
वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥

Sri Ganesha Mantra with Meaning

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

“Oh! Lord (Ganesha), of huge body and curved elephant trunk, whose brilliance is equal to billions of suns, always remove all obstacles from my endeavors.”

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजंबूफलचारुभक्षणम्‌ ।

उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्‌ ॥

“Salutations to Lord Ganesha who has an elephant head, who is attended by the band of his followers, who eats his favorite wood-apple and rose-apple fruits, who is the son of Goddess Uma, who is the cause of destruction of all sorrow. And I salute to his feet which are like lotus.”

सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः ।

लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।

संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

Sumukha, Ekadanta, Kapila, Gajakarnaka, Lambodara, Vikata, Vighnanaasha, Ganaadhipa, Dhuumraketu, Ganaadhyaksha, Bhaalachandra, Gajaanana –

No obstacles will come in the way of one who reads or listens to these 12 names of Lord Ganesha at the beginning of education, at the time of marriage, while entering or exiting anything, during a battle or calamity.

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

“In order to remove all obstacles, one should meditate on (the Lord Ganesha) as wearing a white garment, as having the complexion like the moon, and having four arms and a pleasant countenance.”

मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र ।

वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥

“Oh God who has the mouse as his vehicle, and the sweet modhaka (rice ball) in your hand, whose ears are wide like fans, wearing the sacred thread. Oh son of Lord Shiva who is of short stature and who removes all obstacles, Lord Vinayaka, I bow at your feet.”

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श्री गणपति  अथर्व शीर्षम  – Sri Ganapati Atharva Sheersham

॥ गणपत्यथर्वशीर्षॊपनिषत् (श्री गणॆषाथर्वषीर्षम्) ॥

ॐ भ॒द्रं कर्णॆ॑भिः शृणु॒याम॑ दॆवाः । भ॒द्रं प॑श्यॆमा॒क्षभि॒र्यज॑त्राः । स्थि॒रैरङ्गै॓स्तुष्ठु॒वाग्‍ं स॑स्त॒नूभिः॑ ।

व्यशॆ॑म दॆ॒वहि॑तं॒ यदायुः॑ । स्व॒स्ति न॒ इन्द्रॊ॑ वृ॒द्धश्र॑वाः । स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववॆ॑दाः ।

स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यॊ॒ अरि॑ष्टनॆमिः । स्व॒स्ति नॊ॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥

ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥

ॐ नम॑स्तॆ ग॒णप॑तयॆ । त्वमॆ॒व प्र॒त्यक्षं॒ तत्त्व॑मसि । त्वमॆ॒व कॆ॒वलं॒ कर्ता॑‌உसि ।

त्वमॆ॒व कॆ॒वलं॒ धर्ता॑‌உसि । त्वमॆ॒व कॆ॒वलं॒ हर्ता॑‌உसि । त्वमॆव सर्वं खल्विदं॑ ब्रह्मा॒सि ।

त्वं साक्षादात्मा॑‌உसि नि॒त्यम् ॥ 1 ॥

ऋ॑तं व॒च्मि । स॑त्यं व॒च्मि ॥ 2 ॥

अ॒व त्वं॒ माम् । अव॑ व॒क्तारम्॓ । अव॑ श्रॊ॒तारम्॓ । अव॑ दा॒तारम्॓ । अव॑ धा॒तारम्॓ ।

अवानूचानम॑व शि॒ष्यम् । अव॑ प॒श्चात्ता॓त् । अव॑ पु॒रस्ता॓त् । अवॊत्त॒रात्ता॓त् ।

अव॑ द॒क्षिणात्ता॓त् । अव॑ चॊ॒र्ध्वात्ता॓त् । अवाध॒रात्ता॓त् । सर्वतॊ मां पाहि पाहि॑ सम॒न्तात् ॥ 3 ॥

त्वं वाङ्मय॑स्त्वं चिन्म॒यः । त्वमानन्दमय॑स्त्वं ब्रह्म॒मयः ।

त्वं सच्चिदानन्दा‌உद्वि॑तीयॊ॒‌உसि । त्वं प्र॒त्यक्षं॒ ब्रह्मा॑सि । त्वं ज्ञानमयॊ विज्ञान॑मयॊ॒‌உसि ॥ 4 ॥

सर्वं जगदिदं त्व॑त्तॊ जा॒यतॆ । सर्वं जगदिदं त्व॑त्तस्ति॒ष्ठति । सर्वं जगदिदं त्वयि लय॑मॆष्य॒ति ।

सर्वं जगदिदं त्वयि॑ प्रत्यॆ॒ति । त्वं भूमिरापॊ‌உनलॊ‌உनि॑लॊ न॒भः । त्वं चत्वारि वा॓क्पदा॒नि ॥ 5 ॥

त्वं गु॒णत्र॑याती॒तः । त्वम् अवस्थात्र॑याती॒तः । त्वं दॆ॒हत्र॑याती॒तः । त्वं का॒लत्र॑याती॒तः ।

त्वं मूलाधारस्थितॊ॑‌உसि नि॒त्यम् । त्वं शक्तित्र॑यात्म॒कः । त्वां यॊगिनॊ ध्याय॑न्ति नि॒त्यम् ।

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म॒ भूर्भुवः॒ स्वरॊम् ॥ 6 ॥

ग॒णादिं॓ पूर्व॑मुच्चा॒र्य॒ व॒र्णादीं॓ स्तदन॒न्तरम् । अनुस्वारः प॑रत॒रः । अर्धॆ॓न्दुल॒सितम् । तारॆ॑ण ऋ॒द्धम् ।

एतत्तव मनु॑स्वरू॒पम् । गकारः पू॓र्वरू॒पम् । अकारॊ मध्य॑मरू॒पम् । अनुस्वारश्चा॓न्त्यरू॒पम् । बिन्दुरुत्त॑ररू॒पम् ।

नादः॑ सन्धा॒नम् । सग्ंहि॑ता स॒न्धिः । सैषा गणॆ॑शवि॒द्या । गण॑क ऋ॒षिः । निचृद्गाय॑त्रीच्छ॒न्दः ।

श्री महागणपति॑र्दॆवता । ॐ गं ग॒णप॑तयॆ नमः ॥ 7 ॥

ऎकद॒न्ताय॑ वि॒द्महॆ॑ वक्रतु॒ण्डाय॑ धीमहि । तन्नॊ॑ दन्तिः प्रचॊ॒दया॓त् ॥ 8 ॥

ऎकदन्॒तं च॑तुर्ह॒स्तं॒ पा॒शमं॑कुश॒धारि॑णम् । रदं॑ च॒ वर॑दं ह॒स्तै॒र्बि॒भ्राणं॑ मूष॒कध्व॑जम् ।

रक्तं॑ ल॒म्बॊद॑रं शू॒र्प॒कर्णकं॑ रक्त॒वास॑सम् । रक्त॑ग॒न्धानु॑लिप्ता॒ङ्गं॒ र॒क्तपु॑ष्पैः सु॒पूजि॑तम् ।

भक्ता॑नु॒कम्पि॑नं दॆ॒वं॒ ज॒गत्का॑रण॒मच्यु॑तम् । आवि॑र्भू॒तं च॑ सृ॒ष्ट्या॒दौ॒ प्र॒कृतॆ॓ः पुरु॒षात्प॑रम् ।

ऎवं॑ ध्या॒यति॑ यॊ नि॒त्यं॒ स॒ यॊगी॑ यॊगि॒नां व॑रः ॥ 9 ॥

नमॊ व्रातपतयॆ नमॊ गणपतयॆ नमः प्रमथपतयॆ नमस्तॆ‌உस्तु लम्बॊदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिनॆ शिवसुताय श्रीवरदमूर्तयॆ॒
नमः ॥ 10 ॥

ऎतदथर्वशीर्षं यॊ‌உधी॒तॆ । स ब्रह्मभूया॑य क॒ल्पतॆ । स सर्वविघ्नै॓र्न बा॒ध्यतॆ । स सर्वतः सुख॑मॆध॒तॆ ।

स पञ्चमहापापा॓त् प्रमु॒च्यतॆ । सा॒यम॑धीया॒नॊ॒ दिवसकृतं पापं॑ नाश॒यति । प्रा॒तर॑धीया॒नॊ॒ रात्रिकृतं पापं॑ नाश॒यति ।

सायं प्रातः प्र॑युञ्जा॒नॊ॒ पापॊ‌உपा॑पॊ भ॒वति । धर्मार्थकाममॊक्षं॑ च वि॒न्दति । इदमथर्वशीर्षमशिष्याय॑ न दॆ॒यम् ।

यॊ यदि मॊ॑हाद् दा॒स्यति स पापी॑यान् भ॒वति । सहस्रावर्तनाद्यं यं काम॑मधी॒तॆ । तं तमनॆ॑न सा॒धयॆत् ॥ 11 ॥

अनॆन गणपतिम॑भिषि॒ञ्चति । स वा॑ग्मी भ॒वति । चतुर्थ्यामन॑श्नन् ज॒पति स विद्या॑वान् भ॒वति ।

इत्यथर्व॑णवा॒क्यम् । ब्रह्माद्या॒चर॑णं वि॒द्यान्न बिभॆति कदा॑चनॆ॒ति ॥ 12 ॥

यॊ दूर्वाङ्कु॑रैर्य॒जति स वैश्रवणॊप॑मॊ भ॒वति । यॊ ला॑जैर्य॒जति स यशॊ॑वान् भ॒वति ।

स मॆधा॑वान् भ॒वति । यॊ मॊदकसहस्रॆ॑ण य॒जति स वाञ्छितफलम॑वाप्नॊ॒ति । यः साज्य समि॑द्भिर्य॒जति स सर्वं लभतॆ स स॑र्वं ल॒भतॆ ॥ 13 ॥

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्रा॑हयि॒त्वा सूर्यवर्च॑स्वी भ॒वति । सूर्यग्रहॆ म॑हान॒द्यां प्रतिमासन्निधौ वा ज॒प्त्वा सिद्धम॑न्त्रॊ भ॒वति ।

महाविघ्ना॓त् प्रमु॒च्यतॆ । महादॊषा॓त् प्रमु॒च्यतॆ । महापापा॓त् प्रमु॒च्यतॆ । महाप्रत्यवाया॓त् प्रमु॒च्यतॆ ।

स सर्व॑विद्भवति स सर्व॑विद्भ॒वति । य ऎ॑वं वॆ॒द । इत्यु॑प॒निष॑त् ॥ 14 ॥

ॐ भ॒द्रं कर्णॆ॑भिः शृणु॒याम॑ दॆवाः । भ॒द्रं प॑श्यॆमा॒क्षभि॒र्यज॑त्राः । स्थि॒रैरङ्गै॓स्तुष्ठु॒वाग्‍ं स॑स्त॒नूभिः॑ । व्यशॆ॑म दॆ॒वहि॑तं॒ यदायुः॑ ।

स्व॒स्ति न॒ इन्द्रॊ॑ वृ॒द्धश्र॑वाः । स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववॆ॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यॊ॒ अरि॑ष्टनॆमिः । स्व॒स्ति नॊ॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥

ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥

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गणेशा अश्तोत्तारा सथानमा स्तोत्रं – Ganesha Ashtottara Sata Nama Stotram

विनायकॊ विघ्नराजॊ गौरीपुत्रॊ गणॆश्वरः ।
स्कन्दाग्रजॊव्ययः पूतॊ दक्षॊज़्ध्यक्षॊ द्विजप्रियः ॥ 1 ॥

अग्निगर्वच्छिदिन्द्रश्रीप्रदॊ वाणीप्रदॊज़्व्ययः
सर्वसिद्धिप्रदश्शर्वतनयः शर्वरीप्रियः ॥ 2 ॥

सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता दॆवॊनॆकार्चितश्शिवः ।
शुद्धॊ बुद्धिप्रियश्शान्तॊ ब्रह्मचारी गजाननः ॥ 3 ॥

द्वैमात्रॆयॊ मुनिस्तुत्यॊ भक्तविघ्नविनाशनः ।
ऎकदन्तश्चतुर्बाहुश्चतुरश्शक्तिसंयुतः ॥ 4 ॥

लम्बॊदरश्शूर्पकर्णॊ हरर्ब्रह्म विदुत्तमः ।
कालॊ ग्रहपतिः कामी सॊमसूर्याग्निलॊचनः ॥ 5 ॥

पाशाङ्कुशधरश्चण्डॊ गुणातीतॊ निरञ्जनः ।
अकल्मषस्स्वयंसिद्धस्सिद्धार्चितपदाम्बुजः ॥ 6 ॥

बीजपूरफलासक्तॊ वरदश्शाश्वतः कृती ।
द्विजप्रियॊ वीतभयॊ गदी चक्रीक्षुचापधृत् ॥ 7 ॥

श्रीदॊज उत्पलकरः श्रीपतिः स्तुतिहर्षितः ।
कुलाद्रिभॆत्ता जटिलः कलिकल्मषनाशनः ॥ 8 ॥

चन्द्रचूडामणिः कान्तः पापहारी समाहितः ।
अश्रितश्रीकरस्सौम्यॊ भक्तवांछितदायकः ॥ 9 ॥

शान्तः कैवल्यसुखदस्सच्चिदानन्दविग्रहः ।
ज्ञानी दयायुतॊ दान्तॊ ब्रह्मद्वॆषविवर्जितः ॥ 10 ॥

प्रमत्तदैत्यभयदः श्रीकण्ठॊ विबुधॆश्वरः ।
रमार्चितॊविधिर्नागराजयज्ञॊपवीतवान् ॥ 11 ॥

स्थूलकण्ठः स्वयङ्कर्ता सामघॊषप्रियः परः ।
स्थूलतुण्डॊज़्ग्रणीर्धीरॊ वागीशस्सिद्धिदायकः ॥ 12 ॥

दूर्वाबिल्वप्रियॊज़्व्यक्तमूर्तिरद्भुतमूर्तिमान् ।
शैलॆन्द्रतनुजॊत्सङ्गखॆलनॊत्सुकमानसः ॥ 13 ॥

स्वलावण्यसुधासारॊ जितमन्मथविग्रहः ।
समस्तजगदाधारॊ मायी मूषकवाहनः ॥ 14 ॥

हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सर्वसिद्धिप्रदायकः ।
अष्टॊत्तरशतॆनैवं नाम्नां विघ्नॆश्वरं विभुम् ॥ 15 ॥

तुष्टाव शङ्करः पुत्रं त्रिपुरं हन्तुमुत्यतः ।
यः पूजयॆदनॆनैव भक्त्या सिद्धिविनायकम् ॥ 16 ॥

दूर्वादलैर्बिल्वपत्रैः पुष्पैर्वा चन्दनाक्षतैः ।
सर्वान्कामानवाप्नॊति सर्वविघ्नैः प्रमुच्यतॆ ॥

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गणपति  प्रार्थना गणपथं   – Ganapati Prarthana Ghanapatham

ॐ ग॒णाना॓म् त्वा ग॒णप॑तिग्ं हवामहॆ क॒विं क॑वी॒नाम् उप॒मश्र॑वस्तवम् ।

ज्यॆ॒ष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणस्पत॒ आ नः॑ शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑स्सीद॒ साद॑नम् ॥

प्रणॊ॑ दॆ॒वी सर॑स्वती॒ । वाजॆ॑भिर् वा॒जिनीवती । धी॒नाम॑वि॒त्र्य॑वतु ॥

ग॒णॆ॒शाय॑ नमः । स॒रस्व॒त्यै नमः । श्री गु॒रु॒भ्यॊ॒ नमः ।

हरिः ॐ ॥

घनापाठः

ग॒णाना॓म् त्वा ग॒णाना॓म् ग॒णाना॓म् त्वा ग॒णप॑तिं ग॒णप॑तिं त्वा ग॒णानां॓ ग॒णानां॓ त्वा ग॒णप॑तिम् ॥

त्वा॒ ग॒णप॑तिं त्वात्वा ग॒णप॑तिग्ं हवामहॆ हवामहॆ ग॒णप॑तिं त्वात्वा गणप॑तिग्ं हवामहॆ ।

ग॒णप॑तिग्ं हवामहॆ हवामहॆ ग॒णप॑तिं ग॒णप॑तिग्ं हवामहॆ क॒विन्क॒विग्ं ह॑वामहॆ ग॒णप॑तिं ग॒णप॑तिग्ं हवामहॆ क॒विम् ।

ग॒णप॑ति॒मिति॑ग॒ण-प॒ति॒म् ॥

ह॒वा॒म॒हॆ॒ क॒विं क॒विग्॒ं॒ ह॑वामहॆ हवामहॆ क॒विं क॑वी॒नान्क॑वी॒नां क॒विग्ं॒ ह॑वामहॆ हवामहॆ क॒विन्क॑वी॒नाम् ॥

क॒विन्क॑वी॒नान्क॒वी॒नां क॒विन्क॒विं क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तम मुप॒मश्र॑वस्तम न्कवी॒नां क॒विन्क॒विं क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तमम् ॥

क॒वी॒नामु॑प॒मश्र॑व स्तममुप॒मश्र॑वस्तमं कवी॒ना न्क॑वी॒ना मु॑प॒मश्र॑वस्तमम् । उ॒प॒मश्र॑वस्तम॒ मित्यु॑प॒मश्र॑वः-त॒म॒म् ॥

ज्यॆ॒ष्ट॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्म॑णां ज्यॆष्ठ॒राजं॑ ज्यॆष्ठ॒राजं॑ ज्यॆष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणॊ ब्रह्मणॊ॒ ब्रह्म॑णां ज्यॆष्ठ॒राजं॑ ज्यॆष्ठ॒राजं॑ ज्यॆष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणः । ज्यॆ॒ष्ठ॒राज॒मिति॑ज्यॆष्ठ राजम्॓ ॥

ब्रह्म॑णां ब्रह्मणॊ ब्रह्मणॊ॒ ब्रह्म॑णां॒ ब्रह्म॑णां॒ ब्रह्मणस्पतॆ पतॆब्रह्मणॊ॒ ब्रह्म॑णां॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणस्पतॆ ॥

ब्र॒ह्म॒ण॒स्प॒तॆ॒ प॒तॆ॒ ब्र॒ह्म॒णॊ॒ ब्र॒ह्म॒ण॒स्प॒त॒ आप॑तॆ ब्रह्मणॊ ब्रह्मणस्पत॒ आ ।

प॒त॒ आ प॑तॆपत॒ आनॊ॑न॒ आप॑तॆ पत॒ आनः॑ ॥

आनॊ॑न॒ आन॑श्शृ॒ण्वन् छृण्वन्न॒ आन॑श्शृण्वन् ।

न॒ श्शृण्वन् छृ॒ण्वन्नॊ॑न श्शृ॒ण्वन्नूतिभि॑ रू॒तिभि॒श्शृण्वन्नॊ॑न श्शृ॒ण्वन्नू॒तिभिः॑ ॥

श्शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑ रू॒तिभि॒श्शृ॒ण्वन् छृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑स्सीद सीदॊ॒तिभि॑श्शृ॒ण्वन् छृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑स्सीद ॥

ऊ॒तिभि॑स्सीद सीदॊ॒तिभि॑ रू॒तिभि॑स्सीद॒ साद॑न॒ग्ं॒ साद॑नग्ं॒ सीदॊ॒तिभि॑रू॒तिभि॑स्सीद॒ साद॑नम् । ऊ॒तिभि॒ रित्यू॒ति-भिः॒ ॥

सी॒द॒साद॑न॒ग्ं॒ साद॑नग्ं॒ सीद सीद॒ साद॑नम् । साद॑न॒मिति॒ साद॑नम् ॥

प्रणॊ॑ नः॒ प्रप्रणॊ॑ दॆ॒वी दॆ॒वी नः॒ प्रप्रणॊ॑ दॆ॒वी ।

नॊ॑ दॆ॒वी दॆ॒वी नॊ॑नॊ दॆ॒वी सर॑स्वती॒ सर॑स्वती दॆ॒वी नॊ॑ नॊ दॆ॒वी सर॑स्वती ॥

दॆ॒वी सर॑स्वती॒ सर॑स्वती दॆ॒वी दॆ॒वी सर॑स्वती॒ वाजॆ॒भि॒र्वाजॆ॑भि॒ स्सर॑स्वती दॆ॒वी दॆ॒वी सर॑स्वती दॆ॒वी सर॒स्वती॒ वाजॆ॑भिः ॥

सर॑स्वती॒ वाजॆ॑भि॒ र्वाजॆ॑भि॒ स्सर॑स्वती॒ सर॑स्वती॒ वाजॆ॑भि र्वा॒जिनी॑वती वा॒हिनी॑वती॒ वाजॆ॑भि॒ स्सर॑स्वती॒ सर॑स्वती॒ वाजॆ॑भि र्वा॒जिनी॑वती ॥

वाजॆ॑भिर्वा॒जिनी॑वती वा॒जिनी॑वती वाजॆ॑भि॒र्वाजॆ॑भिर्वा॒जिनी॑वती ।

वा॒जिनी॑व॒तीति॑ वा॒जिनी॑वती वाजॆ॑भि॒र्वाजॆ॑भिर्वा॒जिनी॑वती ।

वा॒जिनी॑व॒तीति॑ वा॒जिनी॑-व॒ती॒ ॥

धी॒ना म॑वि॒त्र्य॑वि॒त्री धी॒नां धी॒नाम॑वि॒त्र्य॑ वत्व वत्ववि॒त्री धी॒नां धी॒नाम॑वि॒त्र्य॑वतु ।

अ॒वि॒त्र्य॑वत्वव त्ववि॒त्र्य॑वि॒ त्र्य॑वतु । अ॒व॒त्वित्य॑वतु ॥

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श्री गणेशा  पंचारातना स्तोत्रं – Sri Ganesha Pancharatna Stotram

मुदा करात्त मॊदकं सदा विमुक्ति साधकम् ।
कलाधरावतंसकं विलासिलॊक रक्षकम् ।
अनायकैक नायकं विनाशितॆभ दैत्यकम् ।
नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥

नतॆतराति भीकरं नवॊदितार्क भास्वरम् ।
नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्ढरम् ।
सुरॆश्वरं निधीश्वरं गजॆश्वरं गणॆश्वरम् ।
महॆश्वरं तमाश्रयॆ परात्परं निरन्तरम् ॥ 2 ॥

समस्त लॊक शङ्करं निरस्त दैत्य कुञ्जरम् ।
दरॆतरॊदरं वरं वरॆभ वक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करम् ।
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करॊमि भास्वरम् ॥ 3 ॥

अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनॊक्ति भाजनम् ।
पुरारि पूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम् ।
प्रपञ्च नाश भीषणं धनञ्जयादि भूषणम् ।
कपॊल दानवारणं भजॆ पुराण वारणम् ॥ 4 ॥

नितान्त कान्ति दन्त कान्ति मन्त कान्ति कात्मजम् ।
अचिन्त्य रूपमन्त हीन मन्तराय कृन्तनम् ।
हृदन्तरॆ निरन्तरं वसन्तमॆव यॊगिनाम् ।
तमॆकदन्तमॆव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥ 5 ॥

महागणॆश पञ्चरत्नमादरॆण यॊ‌உन्वहम् ।
प्रजल्पति प्रभातकॆ हृदि स्मरन् गणॆश्वरम् ।
अरॊगतामदॊषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम् ।
समाहितायु रष्टभूति मभ्युपैति सॊ‌உचिरात् ॥

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श्री गणेश चालीसा

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल ।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल ॥

जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभ काजू ॥

जै गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायक बुद्घि विधाता ॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥

राजत मणि मुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्व-विख्याता ॥

ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्घारे ॥

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी । अति शुचि पावन मंगलकारी ॥

एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ।

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा ॥

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला । बिना गर्भ धारण, यहि काला ॥

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना । पूजित प्रथम, रुप भगवाना ॥

अस कहि अन्तर्धान रुप है । पलना पर बालक स्वरुप है ॥

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना । लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ॥

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं । सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक, देखन चाहत नाहीं ॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो ॥

कहन लगे शनि, मन सकुचा‌ई । का करिहौ, शिशु मोहि दिखा‌ई ॥

नहिं विश्वास, उमा उर भय‌ऊ । शनि सों बालक देखन कहा‌ऊ ॥

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा । बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥

गिरिजा गिरीं विकल है धरणी । सो दुख दशा गयो नहीं वरणी ॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा । शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो । काटि चक्र सो गज शिर लाये ॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो । प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे ॥

बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥

चले षडानन, भरमि भुला‌ई । रचे बैठ तुम बुद्घि उपा‌ई ॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥

तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ा‌ई । शेष सहसमुख सके न गा‌ई ॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी ॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा । जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा ॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै । अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ॥

॥ दोहा ॥

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान ।

नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान ॥

सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश ।

पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश ॥

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PostHeaderIcon विनायक अश्तोत्ताराम्स (Vinayaka Ashtottara Namam)

श्री सिद्धि विनायक नामावलि – 108 Names of Lord Ganesha

ॐ गजाननाय नमः
ॐ गणाध्यक्षाय नमः
ॐ विघ्नाराजाय नमः
ॐ विनायकाय नमः
ॐ द्त्वेमातुराय नमः
ॐ द्विमुखाय नमः
ॐ प्रमुखाय नमः
ॐ सुमुखाय नमः
ॐ कृतिनॆ नमः
ॐ सुप्रदीपाय नमः (10)
ॐ सुख निधयॆ नमः
ॐ सुराध्यक्षाय नमः
ॐ सुरारिघ्नाय नमः
ॐ महागणपतयॆ नमः
ॐ मान्याय नमः
ॐ महा कालाय नमः
ॐ महा बलाय नमः
ॐ हॆरम्बाय नमः
ॐ लम्ब जठराय नमः
ॐ ह्रस्व ग्रीवाय नमः (20)
ॐ महॊदराय नमः
ॐ मदॊत्कटाय नमः
ॐ महावीराय नमः
ॐ मन्त्रिणॆ नमः
ॐ मङ्गल स्वराय नमः
ॐ प्रमधाय नमः
ॐ प्रथमाय नमः
ॐ प्राज्ञाय नमः
ॐ विघ्नकर्त्रॆ नमः
ॐ विघ्नहन्त्रॆ नमः (30)
ॐ विश्व नॆत्रॆ नमः
ॐ विराट्पतयॆ नमः
ॐ श्रीपतयॆ नमः
ॐ वाक्पतयॆ नमः
ॐ शृङ्गारिणॆ नमः
ॐ अश्रित वत्सलाय नमः
ॐ शिवप्रियाय नमः
ॐ शीघ्रकारिणॆ नमः
ॐ शाश्वताय नमः
ॐ बलाय नमः (40)
ॐ बलॊत्थिताय नमः
ॐ भवात्मजाय नमः
ॐ पुराण पुरुषाय नमः
ॐ पूष्णॆ नमः
ॐ पुष्करॊत्षिप्त वारिणॆ नमः
ॐ अग्रगण्याय नमः
ॐ अग्रपूज्याय नमः
ॐ अग्रगामिनॆ नमः
ॐ मन्त्रकृतॆ नमः
ॐ चामीकर प्रभाय नमः (50)
ॐ सर्वाय नमः
ॐ सर्वॊपास्याय नमः
ॐ सर्व कर्त्रॆ नमः
ॐ सर्वनॆत्रॆ नमः
ॐ सर्वसिध्धि प्रदाय नमः
ॐ सर्व सिद्धयॆ नमः
ॐ पञ्चहस्ताय नमः
ॐ पार्वतीनन्दनाय नमः
ॐ प्रभवॆ नमः
ॐ कुमार गुरवॆ नमः (60)
ॐ अक्षॊभ्याय नमः
ॐ कुञ्जरासुर भञ्जनाय नमः
ॐ प्रमॊदाय नमः
ॐ मॊदकप्रियाय नमः
ॐ कान्तिमतॆ नमः
ॐ धृतिमतॆ नमः
ॐ कामिनॆ नमः
ॐ कपित्थवन प्रियाय नमः
ॐ ब्रह्मचारिणॆ नमः
ॐ ब्रह्मरूपिणॆ नमः (70)
ॐ ब्रह्मविद्यादि दानभुवॆ नमः
ॐ जिष्णवॆ नमः
ॐ विष्णुप्रियाय नमः
ॐ भक्त जीविताय नमः
ॐ जित मन्मथाय नमः
ॐ ऐश्वर्य कारणाय नमः
ॐ ज्यायसॆ नमः
ॐ यक्षकिन्नेर सॆविताय नमः
ॐ गङ्गा सुताय नमः
ॐ गणाधीशाय नमः (80)
ॐ गम्भीर निनदाय नमः
ॐ वटवॆ नमः
ॐ अभीष्ट वरदायिनॆ नमः
ॐ ज्यॊतिषॆ नमः
ॐ भक्त निथयॆ नमः
ॐ भाव गम्याय नमः
ॐ मङ्गल प्रदाय नमः
ॐ अव्वक्ताय नमः
ॐ अप्राकृत पराक्रमाय नमः
ॐ सत्य धर्मिणॆ नमः (90)
ॐ सखयॆ नमः
ॐ सरसाम्बु निथयॆ नमः
ॐ महॆशाय नमः
ॐ दिव्याङ्गाय नमः
ॐ मणिकिङ्किणी मॆखालाय नमः
ॐ समस्त दॆवता मूर्तयॆ नमः
ॐ सहिष्णवॆ नमः
ॐ सततॊत्थिताय नमः
ॐ विघात कारिणॆ नमः
ॐ विश्वग्दृशॆ नमः (100)
ॐ विश्वरक्षाकृतॆ नमः
ॐ कल्याण गुरवॆ नमः
ॐ उन्मत्त वॆषाय नमः
ॐ अपराजितॆ नमः
ॐ समस्त जगदाधाराय नमः
ॐ सर्त्वेश्वर्य प्रदाय नमः
ॐ आक्रान्त चिद चित्प्रभवॆ नमः
ॐ श्री विघ्नॆश्वराय नमः (108)

||इति श्रीसिद्धिविनायकाष्टोत्तरशतनामावलिः

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